Tuesday, 2 May 2017

जानिए कौन है आपका शत्रु...और कैसे अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करें..

मार्गदर्शक चिंतन-

बाहरी शत्रु हमें उतना नुकसान नहीं पहुँचाते जितना भीतरी शत्रु पहुँचाते हैं। बाहर का युद्ध आवश्यक भी नहीं है। बाहर के शत्रुओं को तो जितना जल्दी आप मित्र बना लें या उनसे रिश्ते मधुर कर लें अथवा क्षमा माँग लें तो बहुत अच्छा होगा। इससे ना केवल आपको शान्ति प्राप्त होगी अपितु आपकी ऊर्जा अपने लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाएगी।
स्वयं से लड़ो, अपनी अकर्मण्यता से लड़ो। अपनी उस आदत से लड़ो जो हर काम को कल पर टाल देती है। अपने उस हीनभाव से लड़ो जिसने आपके भीतर निराशा भर दी है। 
सोचो ऐसा क्या है जिसे आप अपना बनाते हैं वो दूर क्यों हो जाता है ? अपने उस कड़बे स्वभाव से लड़ो जो किसी को आपका नहीं बनने देता।

Monday, 1 May 2017

क्या है जीवन का धर्म..

मार्गदर्शक चिंतन-

धर्म जीभ का नहीं जीवन का विषय है और धर्म सुनने का नहीं गुनने का विषय है। धर्म चर्चा (कहने) का नहीं अपितु चर्या (करने) का विषय है। मंदिर में जाना यह धर्म की माँग नहीं है अपितु जीवन का मंदिर हो जाना यह धर्म की माँग है। 
धर्म अर्थात जीवन जीने की वो आदर्शमय शैली जहाँ प्रत्येक क्षण त्याग, समर्पण और करुणा के भाव जन्म लेते हैं। जहाँ शत्रु के प्रति भी दया और सब ईश्वर का रूप नजर आने लगते हैं।
धर्म एक ऐसी स्वनिर्मित नाव है जिसमे सवार होकर इस संसार रुपी जलाशय की आनन्दमय यात्रा की जा सकती है। केवल पूजा करते समय झुकना यह धर्म का आदेश नहीं है, सबके सामने झुकना यह धर्म का सन्देश है।
अतः धर्म में जियो, धर्ममय जीओ और धर्म के लिए जियो ताकि आप सच्चे अर्थों में इंसान बन सको।

Sunday, 30 April 2017

क्या है भाग्य और कर्म में अंतर..

मार्गदर्शक चिंतन-

भाग्यवादी अर्थात वे लोग जो यह सोचते हैं कि इस जिन्दगी में जो भी प्राप्त होना होगा हो ही जायेगा। पुरुषार्थवादी अर्थात वे लोग जो यह सोचते हैं और मानते भी हैं कि जिन्दगी में ऊँचा मुकाम किस्मत से नहीं अपितु मेहनत से प्राप्त होता है।
भाग्य आपको ऊँचे कुल में या किसी समृद्ध परिवार जन्म अवश्य दिला सकता है लेकिन जीवन में समृद्धि, उन्नति, सम्मान यह सब केवल परिश्रम से ही सम्भव है।
भाग्य से आपको नाव मिल सकती है मगर बिना पुरुषार्थ किये आप नदी पार नहीं कर सकते। भाग्य एक अवसर है और पुरुषार्थ उसका सदुपयोग। बिना कर्म किये तो भाग्य में लिखा हुआ भी वापिस चला जाता है। परिश्रम ही सफलता की माँग है।
मंजिल तो मिल ही जायेगी भटक कर ही सही।
गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं॥



Saturday, 29 April 2017

क्या है वैराग्य का सही अर्थ...

मार्गदर्शक चिंतन-

वैराग्य का मतलब दुनिया को छोड़ना कदापि नहीं अपितु दुनिया के लिए छोड़ना है। वैराग्य अर्थात एक ऐसी विचारधारा जब कोई व्यक्ति मै और मेरे से ऊपर उठकर जीने लगता है। 
समाज को छोड़कर चले जाना वैराग्य नहीं है अपितु समाज को जोड़कर समाज के लिए जीना वैराग्य है। किसी वस्तु का त्याग वैराग्य नहीं है अपितु किसी वस्तु के प्रति अनासक्ति वैराग्य है।
जब किसी वस्तु को बाँटकर खाने का भाव किसी के मन में आ जाता है तो सच मानिये यही वैराग्य है। दूसरों के दुःख से दुखी होना और अपने सुख को बाँटने का भाव जिस दिन आपके मन में आने लग जाता है, उसी दिन गृहस्थ में रहते हुए आप सच्चे वैरागी बन जाते हो।
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो,मन को विषयों से हरदम हटाते चलो।
कृष्ण दर्शन तो देंगे कभी ना कभी,ऐसा विश्वास मन में जमाते चलो॥

Thursday, 27 April 2017

क्या है अमरत्व का अर्थ..

मार्गदर्शक चिंतन-

अमर हो जाने का अर्थ आयु का बढ़ जाना नहीं है अपितु कीर्ति का चारों तरफ फ़ैल जाना है। आदमी मर कर भी अमर हो सकता है और जीते जी भी मर सकता है।
जो जीवन समाज के लिए अनुपयोगी बन जाता है उसका जीवन उस जड़ वृक्ष से भी तुच्छ है जो फल ना दे कम से कम छाया तो प्रदान करता है। फूल की आयु ज्यादा लम्बी नहीं होती। वह कुछ समय के लिए खिलता है और अपना सौन्दर्य बिखेरकर चला जाता है। 
जितना समय आप परमार्थ में जीते हैं उतनी आयु आपकी स्वतः अमर हो जाती है और दूसरों के लिए किया गया वो कर्म भी लोगों के दिल में रहता है। जितना जीओ मै और मेरे से ऊपर उठकर जिओ। यही अमरता है।
ना गन्दगी पसंद है ना बन्दगी पसंद है।
दूध सी धुली-धुली फूल सी खिली- खिली 

Wednesday, 26 April 2017

कैसे बनाएं दूसरों के दिल में जगह..

मार्गदर्शक चिंतन-

आज हमने इमारतें तो खूब ऊँची-ऊँची बना ली हैं मगर हमारा मन बहुत छोटा हो गया है। निसंदेह आज का युग एक प्रतिस्पर्धा का युग है और ऊँचे मकानों की प्रतिस्पर्धा में आज ऊँचे मानवों का निर्माण अवरूद्ध हो गया है। आज हमने घरों की दीवारें ही बड़ी नहीं कर दी हैं अपितु दिलों की दूरियाँ भी बड़ी कर ली हैं।
कैसे भी हो सुख संपदा होनी चाहिए ? भले उसके लिए हमें कितनों को भी कष्ट पहुँचाना पड़ जाये। हमारे अन्दर से आवाज आनी ही बंद हो गई कि यह गलत है और यह सही। अपने दिल को इतना बड़ा बनाओ कि उसमें अपने पराए सब समां जायें। अपने कद को इसलिए ऊँचा न बना लेना कि सब आपको देख सकें अपितु इसलिए ऊँचा बना लेना कि आप सबको देख सकें।
बहुत ही आसान है जमीं पर मकान बना लेना।
दिल में जगह बनाने में,जिंदगी गुजर जाया करती है॥

दिल में बने रहना ही सच्ची शौहरत है।
वरना मशहूर तो,कत्ल करके भी हुआ जा सकता है॥

Tuesday, 25 April 2017

क्या है दान का मतलब..धन के बिना कैसे करें दान..

मार्गदर्शक चिंतन-

सामान्यतया आदमी दान का मतलब किसी को धन देने से लगा लेता है। धन के अभाव में भी आप दान कर सकते हैं। तन और मन से किया गया दान भी उससे कम श्रेष्ठ नहीं।
किसी भूखे को भोजन, किसी प्यासे को पानी, गिरते हुए को संभाल लेना, किसी रोते बच्चे को गोद में उठा लेना, किसी अनपढ़ को इस योग्य बना देना कि वह स्वयं हिसाब किताब कर सके और किसी वृद्ध का हाथ पकड़ उसके घर तक छोड़ देना यह भी किसी दान से कम नहीं है।
हम किसी को उत्साहित कर दें, आत्मनिर्भर बना दें या साहसी बना दें, यह भी दान है। अगर आप किसी को गिफ्ट का ना दे पायें तो मुस्कान का दान दें, आभार भी काफी है। किसी के भ्रम-भय का निवारण करना और उसके आत्म-उत्थान में सहयोग करना भी दान है।
किसी रोज प्यासे को पानी क्या पिला दिया।
लगा जैसे प्रभु ने अपना पता बता दिया॥

रोशनी करने का ढंग बदलना है।
चिराग नहीं जलाने, चिराग बन कर जलना है॥