Tuesday, 14 November 2017

किसी की मदद करने से क्या लाभ मिलता है जानिए...

मार्गदर्शक चिंतन-

जो मनुष्य दूसरों का भला करके भूल जाते हैं उनका हिसाब प्रकृति स्वयं याद रखा करती है मगर जो मनुष्य आदतन अपने पुण्यों का बही खाता लिए फिरते हैं इस प्रकृति द्वारा फिर उनके पुण्य कर्मों को विस्मृत कर दिया जाता है।
जो भी पुण्य तुम्हारे द्वारा संपन्न किये जाते हैं, सत्य समझ लेना यह प्रकृति निश्चित ही उन्हें संचित कर देती है और आवश्यकता पड़ने पर तुम्हारी विस्मृति के बावजूद भी उनका यथा योग्य फल अवश्य ही दे दिया करती है।
याद रखना मनुष्य केवल खाता रख सकता है मगर उसका परिणाम घोषित नहीं कर सकता। वह अधिकार तो केवल और केवल इस प्रकृति के पास ही सुरक्षित है। अतः भला करो और भूल जाओ उचित समय आने पर प्रकृति स्वयं पुरुस्कृत कर देगी।

Monday, 13 November 2017

पत्थर दिल इंसान को कैसे पिघलाया जा सकता है..

मार्गदर्शक चिंतन-

सत्य है कि लोहे से ही लोहे को काटा जा सकता है और पत्थर से ही पत्थर को तोडा जा सकता है। मगर ह्रदय चाहे कितना भी कठोर क्यों ना हो उसको पिघलने के लिए कभी भी कठोर वाणी कारगर नहीं हो सकती क्योंकि वह केवल और केवल नरम वाणी से ही पिघल सकता है।
क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है। समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम रखो, संयम ही आपको क्लेशों से बचा सकता है।
आँखों में शर्म रहे और वाणी नरम रहे तो समझ लेना परम सुख आपसे दूर नहीं।
रूठते हैं शब्द भी अपने गलत इस्तेमाल होने पर,देखा है हमने शब्दों को भी अकसर रूठते हुए।

Sunday, 12 November 2017

क्या है बोलने से ज्यादा सुनने का लाभ..

मार्गदर्शक चिंतन-

वक्ता तो हर कोई बनना चाहता है मगर श्रोता कोई भी नहीं क्योंकि यहाँ पर हर आदमी दूसरों को सुनाना ज्यादा पसंद करता है बजाय खुद सुनने के। एक अच्छा वक्ता बनना जितना श्रेष्ठ है, एक अच्छा श्रोता बनना भी उससे भी श्रेष्ठ। 
एक अच्छे श्रोता होने का अर्थ है अपने विवेक के बल पर यह तय करने की क्षमता रखना कि मेरे स्वयं के लिए कौन सी बात सुननी हितकर है और कौन सी अहितकर ? केवल बोलने की सामर्थ्य रखना ही नहीं अपितु सुनने की सामर्थ्य रखना भी एक कला है।
केवल सुना जाए यही श्रोता का लक्षण नहीं है अपितु क्या सुना जाए ? और उसमे से कितना चुना जाए ? यही एक श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण है। एक अच्छा वक्ता होने के लिए साधक का बहुश्रुत होना बहुत जरुरी है।

Saturday, 11 November 2017

कौन है गुलाम..

मार्गदर्शक चिंतन-

गुलामी की वजह से हम कमजोर नहीं बनते अपितु कमजोरी हमें गुलाम बना देती है। दूसरों के नियंत्रण में रहने का नाम गुलामी नहीं अपितु स्वनियंत्रित न हो पाना, यही महागुलामी है।
गुलामी का मतलब यह नहीं कि आप दूसरों की इच्छा से काम कर रहे हैं अपितु यह है कि आप अनिच्छा से काम कर रहे हैं।
गुलामी का अर्थ शरीरगत बंधन नहीं अपितु विचारगत पराधीनता है।
किसी भी दशा में आपके श्रेष्ठ विचारों का अतिक्रमण न हो इसी का नाम स्वतंत्रता है !

मंजर बदल देती है जीने की अदा,कोई पिंजरे के बाहर भी कैद रहा, कोई पिंजरे के भीतर भी आज़ाद जिया।

Thursday, 9 November 2017

जानिए कैसा है देवाधिदेव महादेव का जीवन..

मार्गदर्शक चिंतन-

 शिव होने का अर्थ है, एक ऐसा जीवन जो मैं और मेरे से ऊपर जिया गया हो। जहाँ जीवन तो है मगर जीवन के प्रति आसक्ति नहीं और जहाँ रिश्ते तो हैं मगर किसी के भी प्रति राग और द्वेष नहीं।
जहाँ प्रेम तो है मगर मोह नहीं और जहाँ अपनापन तो है मगर मेरापन नहीं। जहाँ ऐश्वर्य तो है मगर विलास नहीं और जहाँ साक्षात माँ अन्नपूर्णा है मगर भोग नहीं। जहाँ नृत्य भी है, संगीत भी है, त्याग भी है और योग भी है मगर अभिमान नहीं।
जीवन की वह स्थिति जब हम विषमता में भी जीना सीख जाएँ, जब हम निर्लिप्त रह कर बांटकर खाना सीख जाएँ और जब हम काम की जगह राम में जीना सीख जाएँ, वास्तव में शिव हो जाना ही है।

Wednesday, 8 November 2017

कैसी होती है भगवान कृपा...

मार्गदर्शक चिंतन-

जिस प्रकार एक वैद्य के द्वारा दो अलग-अलग रोग के रोगियों को अलग अलग दवा दी जाती है। किसी को मीठी तो किसी को अत्याधिक कडवी दवा दी जाती है। लेकिन दोनों के साथ भिन्न - भिन्न व्यवहार किये जाने के बावजूद भी उसका उद्देश्य एक ही होता है, रोगी को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना।
ठीक इसी प्रकार उस ईश्वर द्वारा भी भले ही देखने में भिन्न -भिन्न लोगों के साथ भिन्न - भिन्न व्यवहार नजर आये मगर उसका भी केवल एक ही उद्देश्य होता है और वह है, कैसे भी हो मगर जीव का कल्याण करना।
सुदामा को अति दरिद्र बनाके तारा तो राजा बलि को सम्राट बनाकर तारा। शुकदेव जी को परम ज्ञानी बनाकर तारा तो विदुर जी को प्रेमी बना कर। पांडवों को मित्र बना कर तारा व कौरवों को शत्रु बनाकर। स्मरण रहे, भगवान केवल क्रिया से भेद करते हैं भाव से नहीं।

Tuesday, 7 November 2017

कैसा हो उपहार..

मार्गदर्शक चिंतन-

मूल्य उपहार का नहीं उसकी उपयोगिता का होता है। जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति के लिए स्वर्ण अलंकारों और एक भूखे व्यक्ति के लिए स्वर्ण पात्रों का तब तक कोई मूल्य नहीं, जब तक उन्हें पानी और भोजन की प्राप्ति न हो जाए।
यह बात मायने नहीं रखती कि आपने सामने वाले को क्या दिया ? अपितु यह बात मायने रखती है कि वह वस्तु उसके किस काम आई। किसी गरीब बच्चे को किताब देने से ज्यादा श्रेष्ठ है, उसे इस काबिल बनाने का प्रयास किया जाए कि वह उस किताब को पढ़ भी सके।
किसी अंधे को लाठी पकडा देने से श्रेष्ठ है, वह उन हाथों का दर्शन कर सके जिसने उसे लाठी पकड़वानी चाही। अतः उपहार मूल्यवान ही हो यह जरुरी नहीं मगर उपयोगी हो यह जरुरी है। याद रखना निर्मल भाव के आगे किसी मूल्य की कोई कीमत भी नहीं।