Saturday, 30 September 2017

जीवन रुपी वृक्ष को कैसे संवारें..

मार्गदर्शक चिंतन-

जीवन एक वृक्ष है, संस्कार इसमें दिया जाने वाला खाद पानी और आचरण ही इसका फल है। जीवन रुपी इस वृक्ष में संस्कार रुपी खाद पानी का जितना सुन्दरतम सिंचन किया जाएगा, आचरण रुपी फल भी उतना ही मधुरतम व श्रेष्ठतम होगा।
हरियाली अवश्य किसी वृक्ष का सौंदर्य है फल उसकी सार्थकता । जिस प्रकार फल वृक्ष की उपयोगिता को बड़ा देते हैं। ऐसे ही हमारा आचरण ही संसार में हमारी उपयोगिता का निर्धारण भी करता है।
फल जितना सुस्वादु व मधुर होगा वृक्ष की उपयोगिता उतनी ही अधिक। ठीक ऐसे ही हमारा आचरण भी जितना मधुर अथवा श्रेष्ठ होगा समाज में हमारी उपयोगिता भी उतनी ही अधिक होगी।

Thursday, 28 September 2017

नवरात्र रहस्य..जय मां सिद्धिदात्री

नवरात्र के समापन यानि नवम दिवस में सिद्धि प्रदान कराने वाली देवी सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है। सिद्धि का अर्थ भौतिक वैभव नहीं अपितु आध्यात्मिक वैभव प्राप्त करना है। जो प्रभु की सुधि दिलाए वही सिद्धि है।
जो प्रभु का विस्मरण करादे वह दौलत किसी काम की नहीं। वह बाहर से तो तृप्त करती है पर भीतर का खालीपन नहीं जाता। 9 दिन के ये व्रत, अनुष्ठान व्यक्ति को शारीरिक और आत्मिक रूप से शुद्ध करते हैं। जिसका जीवन शुद्ध है वही वुद्ध है और वही सच्ची सिद्धि को प्राप्त कर पाता है।
शैल ( पत्थर ) पुत्री अर्थात जड़त्व से प्रारम्भ होने वाला यह पर्व सिद्धिका पर जाकर सम्पन्न होता है। जीवन का प्रारम्भ चाहे मूढ़ता से हो कोई बात नहीं पर समाप्ति सिद्धि (ज्ञान प्राप्ति) से हो, यही जीवन की वास्तविक उन्नति है। माँ से प्रार्थना, हमें गोविन्द चरणों में प्रेम हो, ऐसी सिद्धि दे दो।

परमार्थ में जीना ही कल्याणकारी है...

मार्गदर्शक चिंतन-

आज का मनुष्य समझदार कम और स्वार्थी ज्यादा हो गया इसलिए इसके कर्म भी अब समझदारी भरे नहीं अपितु स्वार्थ भरे ज्यादा होने लगे। शुभ कर्म तो आज का आदमी कर रहा है मगर इसका उद्देश्य बदल गया है। यह अब मंदिर अर्चना करने कम और याचना करने ज्यादा जाने लगा है।
समझदारी की बातें करने वाला यह आदमी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए कहाँ तक जा सकता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। निम्नता का कोई ऐसा गर्त नहीं जहाँ आज का आदमी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए न पहुँचा हो।
स्वसुख के लिए किए जाने वाला प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म भी स्वार्थ व परहित की दृष्टि से संपन्न प्रत्येक सामान्य कर्म भी परमार्थ है। स्वार्थ क्षणिक सुख है और परमार्थ शाश्वत आनंद। अत: स्वार्थ में नहीं परमार्थ में जीना सीखो।

Wednesday, 27 September 2017

क्यों जरुरी है तुलसी की माला धारण करना..



तुलसी की माला जरूर पहने
साधारण काष्ठ नहीं है तुलसी की माला.... साधारण काष्ठ नहीं है तुलसी की माला वैष्णव चिह्न से भी आगे की चीज़ है। हमारा यह शरीर भगवान का मंदिर है जिसमें युगल सरकार राधाकृष्ण का वास है, और हमारी आत्मा ही प्रभु का शरीर है। जब हम तुलसी की माला गले में पहनते हैं तो हम कहते हैं:- "भगवान हम जैसे भी हैं तुम्हारे ही हैं। "तुलसी की माला समर्पण के इसी पूर्णत्व का प्रतीक है, तथा अन्य वैषणव चिह्न - तिलक और छापा (रामनौमी). सुनिश्चित जानिये इन्हें पहनने का लाभ आपको तो मिलेगा साथ परिवार के अन्य लोगों को भी इसका लाभ मिलेगा। कविवर रसखान अपने गले में असंख्य तुलसी मालाओं को धारण किए रहते थे। एक बार किसी ने रसखान जी से पूछा- 'महाराज आप इतनी अधिक काष्ठ मालाएं क्यों पहने रहते हैं? 'रसखान जी बोले - 'मैं नीच कुल में पैदा हुआ हूँ, मैं नहीं जानता पाप क्या है, लेकिन इतना मैंने संतों से सुना है की तुलसी की यह माला साधारण काष्ठ की माला नहीं है। यह मेरा भी बेड़ा पार कर देगी और मेरे कुल का भी बेड़ा पार होगा ऐसा मैं सोचता हूँ। मुझे यह जानने में अब बहुत देर हो गई है कि पाप का उपाय क्या है, लेकिन यह साधारण सा उपाय तो मैं कर ही सकता हूँ। इसीलिए मैं इतना ब्रह्म काष्ठ धारण किये रहता हूँ।
'तुलसी जी की काष्ठ को ब्रह्म काष्ठ कहा गया है। वर्षों पहले साधारण लकड़ी के स्लीपर (स्लीपर यानी लकड़ी के लठ्ठे) को जोड़कर उस दौर में यूं ही नदी में बहा दिया जाता था, जिनको नियत स्थान पर पानी से निकाल भी लिया जाता था।उनके साथ उन पर बैठे-खड़े छोटे बच्चे तथा बड़े मीलों मील तक सफर करते थे। साधारण लकड़ी भी जब आपको जल में डूबने नहीं देती तो यह तो कल्याणी ब्रह्मकाष्ठ है तुलसी की माला।कल्याणी इसलिए कि यह जगत का कल्याण करती है। महाविष्णु के चरण कमलों की शोभा हैं, प्रिया हैं तुलसी जी। तुलसी की माला पहनकर घर पर साधारण स्नान करने वालों को तमाम तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। यदि मृत्यु के समय किसी के गले में तुलसी की माला का एक मनका भी मौजूद रहता है तो सुनिश्चित जानो वह नरक (निम्नतर योनियों ) में नहीं जाएगा, ऐसा हमारे शास्त्र कहते हैं। पद्मपुराण, गरुण एवं स्कन्दपुराण में तुलसी की महिमा का बखान आया है। मान्यता है तुलसी की माला पहनने के लिए सुपात्र बनना ज़रूरी है। आपका आचरण शुद्ध हो, खानपान शुद्ध हो यानी आप वही खाएं जिसे आप ठाकुर जी पर भी अर्पित कर सकते हों। है न फायदा आपका खानपान शुद्ध हो जाएगा तो आपका स्वास्थ्य भी ठीक बना रहेगा और मन भी।स्वस्थ चित्त में ही स्वस्थ मन का आवास होता है। तुलसी की माला मानसिक परेशानियों को घटाने तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने की असली औषधि है। संकोच न करें तुलसी माला पहनने में। कई सभ्रांत महिलाएं ऐसा सोचतीं हैं की रज का तिलक और तुलसी की माला सुहागिन स्त्रियों को नहीं पहननी चाहिए। मगर हमारे शास्त्रों में ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है कि सुहागिन स्त्रियों को तुलसी माला नहीँ पहनी चाहिए। इसलिए सभी स्त्रियों ,पुरुषों एवं बच्चों को बगैर किसी शंका और संकोच के तुलसी माला को धारण करना चाहिए।
जय श्रीराधे

क्यो जरुरी है मस्तक पर तिलक लगाना...

जय श्री राधे ।
चंदन तिलक अवश्य लगाएं ~
हमारे धर्मं में चन्दन के तिलक का बहुत महत्व बताया गया है
चन्दन तिलक का महत्व~
शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।
भगवान को चंदन अर्पण~
भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे यानी हम ठंडे दिमाग से काम करे। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण~
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।तिलक का महत्वहिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है । मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एकतरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।
शास्त्रों के अनुसार~
शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैःशनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।
चन्दन लगाने के प्रकार~
स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरान्त वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। धार्मिक तिलक स्वयं के द्वारा लगाया जाता है, जबकि सांस्कृतिक तिलक दूसरा लगाता है।
नारद पुराण में उल्लेख आया है-
१. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र,
२. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड,
३. वैश्य को अर्धचन्द्र,
४. शुद्र को वर्तुलाकार चन्दन से ललाट को अंकित करना चाहिये।
योगी सन्यासी ऋषि साधकों तथा इस विषय से सम्बन्धित ग्रन्थों के अनुसार भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान है।
चन्दन के प्रकार~
१. हरि चन्दन - पद्मपुराण के अनुसार तुलसी के काष्ठ को घिसकर उसमें कपूर, अररू या केसर के मिलाने से हरिचन्दन बनता है।
२. गोपीचन्दन- गोपीचन्दन द्वारका के पास स्थित गोपी सरोवर की रज है, जिसे वैष्णवों में परम पवित्र माना जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों की भक्ति से प्रभावित होकर द्वारका में गोपी सरोवर का निर्माण किया था, जिसमें स्नान करने से उनको सुन्दर का सदा सर्वदा के लिये स्नेह प्राप्त हुआ था। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर वैष्णवों में गोपी चन्दन का ऊर्ध्वपुण्ड्र मस्तक पर लगाया जाता है।
जय श्री राधे।

नवरात्र रहस्य..जय मां महागौरी

नवरात्र के अष्टम दिन में आज माँ के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। हमारे शास्त्रों का, ऋषियों का चिंतन तो देखो नौ दिन के पूरे पर्व को ही नारी की आराधना का पर्व बना दिया।
महागौरी की पूजा करने वाले देश में आज गर्भ के भीतर गौरी को मारा जा रहा है। पुत्र की चाह में उसकी निर्ममता से हत्या की जा रही है। ना वह गर्भ के भीतर सुरक्षित है और ना ही गर्भ के वाहर। बेटी, बहिन, पत्नी, माँ, दादी ना जाने कितने रूपों में हमें कन्या संभालती है।
आज अष्टमी को कन्याओं को पूजते समय दो संकल्प जरूर ले लेना। पहला ये कि गर्भ के भीतर किसी गौरी की हत्या ना तो करेंगे ना करने देंगे। दूसरा स्त्री के प्रति सम्मान की दृष्टि रखेंगे और जीवन के किसी भी सम्बन्ध में नारी हमारे द्वारा या हमारे कारण दुख ना पाए। यही वास्तविक और यथार्थ में महागौरी पूजा होगी

कैसा हो आपका कर्म...

मार्गदर्शक चिंतन-

कर्म यदि भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति के लिए किया जाता है तो वह रोग कहलाता है। और वही कर्म यदि ईश्वर प्राप्ति के लिए किया जाता है तो वह योग बन जाता है।
योग का अर्थ कर्म विशेष तो नहीं हाँ लक्ष्य विशेष जरूर है। कर्म क्या किया यह महत्वपूर्ण नहीं अपितु क्यों किया यह महत्वपूर्ण है।
भागवत जी में गोपियों का रोना भी योग बन गया तो महाभारत में अर्जुन का लड़ना व रामायण में शबरी का भगवान को झूठे बेरों का भोग लगाना ही योग बन गया। लक्ष्य भोग है तो प्रत्येक कर्म रोग है और लक्ष्य अगर ईश्वर है तो फिर प्रत्येक कर्म योग है।