Sunday, 5 February 2017

जानिए कौन हैं भगवान शिव के माता-पिता...

कौन हैं शिव जी के माता पिता?

शकंर जी की माता श्री दुर्गा देवी (अष्टंगी देवी) है तथा पिता सदाशिव अर्थात् “काल ब्रह्म” है।
त्रिदेवों में से एक देव हैं शिव, भगवान शिव को देवों के देव महादेव भी कहा जाता है। भगवान शिव को कई और नामों से पुकारा जाता है जैसे- महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ इत्यादि। तंत्र साधना में भगवान शिव को भैरव के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं भगवान शिव, वेद में इन्हें रुद्र के नाम से भी जाना जाता है।
शिव इंसान की चेतना के अन्तर्यामी हैं यानी इंसान के मन की बात पढ़़ने वाले हैं। इनकी अर्धांग्नि यानि देवी शक्ति को माता पार्वती के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव के दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश हैं और एक पुत्री अशोक सुंदरी भी हैं। शिव जी आपने अधिकत्तइर योगी या ध्याान की मुद्रा में ही देखा होगा। लेकिन उनकी पूजा शिवलिंग और मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव जी के गले में हमेशा नाग देवता विराजमान रहते हैं और इनके हाथों में डमरू और त्रिशूल दिखाई देता हैं। भगवान सदाशिव परम ब्रह्म है। अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान इन्हीं को ईश्वर कहते हैं।
अकेले रहकर अपनी इच्छाम से सभी ओर विचरण करने वाले सदाशिव ने अपने शरीर से देवी शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने अंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी.देवी शक्ति को पार्वती के रूप में जाना गया और भगवान शिव को अर्धनारिश्वबर के रूप में। वहीं देवी शक्ति को प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकार रहित माना गया.श्रीमद् देवी महापुराण के मुताबिक, भगवान शिव के पिता के लिए भी एक कथा है। देवी महापुराण के मुताबिक, एक बार जब नारदजी ने अपने पिता ब्रह्माजी से सवाल किया कि इस सृष्टि का निर्माण किसने किया? आपने, भगवान विष्णु ने या फिर भगवान शिव ने? आप तीनों को किसने जन्म दिया है यानी आपके तीनों के माता-पिता कौन हैं?तब ब्रह्मा जी ने नारदजी से त्रिदेवों के जन्म की गाथा का वर्णन करते हुए कहा कि देवी दुर्गा और शिव स्वरुप ब्रह्मा के योग से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई है।यानि प्रकृति स्वरुप दुर्गा ही माता हैं और ब्रह्म यानि काल-सदाशिव पिता हैं।
एक बार श्री ब्रह्मा जी और श्री विष्णु जी का इस बात पर झगड़ा हो गया कि ब्रह्मा जी ने कहा मैं तेरा पिता हूँ क्योंकि यह सृष्टिी मुझसे उत्पन्न हुई है, मैं प्रजापिता हूँ। इस पर विष्णु जी ने कहा कि मैं तेरा पिता हूँ, तू मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुआ है।

सदाशिव ने विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच आकर कहा, हे पुत्रों! मैंने तुमको जगत की उत्पत्ति और स्थिति रूपी दो कार्य दिए हैं, इसी प्रकार मैंने शंकर और रूद्र को दो कार्य संहार और तिरोगति दिए हैं, मुझे वेदों में ब्रह्म कहा है. मेरे पाँच मुख हैं, एक मुख से अकार (), दूसरे मुख से उकार (), तीसरे मुख से मुकार ()........................... , चौथे मुख से बिन्दु (.) तथा पाँचवे मुख से नाद (शब्द) प्रकट हुए हैं, उन्हीं पाँच अववयों से एकीभूत होकर एक अक्षर ओम् (ऊँ) बना है, यह मेरा मूल मन्त्र है। उपरोक्त शिव महापुराण के प्रकरण से सिद्ध हुआ कि श्री शकंर जी की माता श्री दुर्गा देवी (अष्टंगी देवी) है तथा पिता सदाशिव अर्थात् “काल ब्रह्म” है।

बदले की भावना को बदलो..मिलेगा आनंद..

मार्गदर्शक चिंतन-

किसी से बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का विचार ज्यादा श्रेष्ठ है। महतवपूर्ण यह नहीं कि दूसरे आपको गलत कहते हैं अपितु यह कि आप स्वयं गलत नहीं करते हैं। 
बदले की आग दूसरों को कम स्वयं को ज्यादा जलती है। बदले की आग उस मशाल की तरह है, जिसे दूसरों को जलाने से पहले स्वयं को जलना पड़ता है। इसलिए सहनशीलता के शीतल जल से जितनी जल्दी हो सके इस आग को रोकना ही वुद्धिमत्ता है।
बदले की भावना आपके समय को ही नष्ट नहीं करती अपितु आपके स्वास्थ्य तक को नष्ट कर जाती है। दुनिया को बदल पाना बड़ा मुश्किल है इसलिए स्वयं को बदलने में ऊर्जा लगाना ही सुखी होने का और सफल होने का एक मात्र उपाय है।

Saturday, 4 February 2017

जानिए क्या है मानसिक आलस्य..

मार्गदर्शक चिंतन-

मानसिक आलस्य बहुत खतरनाक होता है। शरीर द्वारा किसी काम को करने की असमर्थता व्यक्त करना, यह शारीरिक आलस्य है। मगर किसी काम को करने से पहले ही यह सोच लेना कि यह काम मेरे वश का नहीं है अथवा किसी काम को करने से पहले ही हार मानकर बैठ जाना, पीछे हट जाना यह मानसिक आलस्य है।
इस मानसिक आलस्य के कारण बहुत लोग दुखी होते हैं, असफल होते हैं और इसी निराशा के कारण डिप्रेशन तक पहुँच जाते हैं। इस मानसिक आलस्य को दूर करने का उपाय है सदचिन्तन, सकारात्मक चिन्तन और अच्छे लोगों का संग।
एक विचार आदमी के संसार को बदल देता है। यदि वह बिचार शुभ है तो वह ना केवल स्वयं की प्रगति का कारण बनता है अपितु दूसरे लोगों के जीवन को भी बदलने तक की सामर्थ्य रखने वाला होता है। अतः हमेशा अच्छा सोचो ताकि मानसिक आलस्य से बच सको। 

Thursday, 2 February 2017

जानिए विवाह की रस्मों का वैज्ञानिक आधार...

वैवाहिक रस्म रिवाज ~ अंधविश्वास या विज्ञान
बुरी शक्तियों के प्रभाव को रोकते हैं भारतीय शादियों के रस्म-रिवाज। भारत परंपराअों का देश है यहां कई तरह के रीति-रिवाज निभाए जाते है। चाहें आज जमाना कितना भी बदल गया हो, पर कुछ रस्म-रिवाज आज भी वैसे के वैसे ही चले आ रहें हैं। भारतीय परंपरा में शादी को एक बहुत ही शुभ अवसर माना जाता है। इसलिए शादी के उत्‍सव में बुरी शक्तियों के प्रभाव को रोकने के लिए कई रस्में निभाई जाती है। कई लोग ऐसा मानते हैं कि ये रस्में केवल अंधविश्वास हैं परंतु आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इनमें से कई रस्मों के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। जैसे-जैसे वैज्ञानिक इन पारंपरिक रस्मों की गहराई में गए उन्होंने देखा कि इन रस्मों के साथ तर्क और विज्ञान जुड़े हुए हैं। भारतीय शादियों में निभाई जाने वाली इन रस्मों का उद्देश्य शरीर, दिमाग और आत्मा के बीच पवित्र संबंध स्थापित करना है।
मेहंदी लगाना : भारतीय शादियों में 'मेहंदी की रात' शादी के पहले की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है। यह केवल एक मजेदार रस्म ही नहीं है बल्कि इसका सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है। मेहंदी में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं। यह ठंडक प्रदान करने का काम करती है, जो वर वधू को तनाव, सिरदर्द और बुखार से आराम दिलाता है। यह नाखूनों की वृद्धि में भी सहायक होता है। मेंहदी कई प्रकार के वायरल और फंगल इन्फेक्शन से भी रक्षा करती है।
हल्दी लगाना : पारंपरिक रूप से हल्दी का उपयोग वर वधू के चेहरे पर प्राकृतिक निखार लाने के लिए किया जाता है। इसके पीछे एक अन्य पारंपरिक कारण वर वधू को बुरी नज़र से बचाना होता है। यदि इस रस्म के पीछे वैज्ञानिक कारण की बात करें तो हल्दी को चमत्कारिक जड़ी-बूटी कहा जाता है क्योंकि इसमें बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं और इस प्रकार इस पूरी प्रक्रिया में शरीर को हल्दी का उत्तम औषधीय लाभ मिलता है। हल्दी त्वचा के बैक्टीरिया को नष्ट कर देती है तथा वर वधू पर निखार लाती है।
चूड़ियां पहनना : भारतीय महिलाएं हाथों में चूड़‍ियां पहनती हैं। कलाईयों में कई एक्युप्रेशर पॉइंट्स होते हैं। चूड़ी पहनने पर इन पॉइंट्स पर दबाव पड़ता है जो आपको स्वस्थ रखने में सहायक होता है। चूड़ियों और आपकी त्वचा के बीच होने वाला घर्षण होता है और उसमें एक प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है, यह ऊर्जा शरीर के रक्त संचार को नियंत्रित करती है। साथ ही ढेर सारी चूड़‍ियां होने की वजह से वो ऊर्जा बाहर निकलने के बजाए शरीर के अंदर चली जाती है।
मांग में सिन्दूर भरना : हिंदू स्त्री के लिए शादीशुदा होने की निशानी होने के अलावा सिन्दूर के कुछ स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। इसमें हल्दी, चूना, कुछ धातु और पारा होता है। जब वधू की मांग में सिन्दूर भरा जाता है तो पारा शरीर को ठंडा करता है तथा शरीर को आराम महसूस होता है। इससे उनमें यौन इच्छा भी उत्पन्न होती है। और यही कारण है कि विधवा या कुंआरी स्त्रियों को सिन्दूर लगाने की अनुमति नहीं है।
बिछुए पहनना : आपने अक्सर ही हिंदू दुल्हनों को पैर की दूसरी उंगली में रिंग पहने हुए देखा होगा।इसके पीछे भी दो वैज्ञानिक कारण हैं। पहला यह कि पैर की दूसरी उंगली में एक विशेष नस होती है जो गर्भाशय से गुज़रती है तथा हृदय तक जाती है। बिछुए गर्भाशय को मज़बूत बनाते हैं तथा मासिक धर्म के चक्र को नियमित करते हैं। दूसरा, ये बिछुए चांदी के बने होते हैं, चांदी पृथ्वी से ऊर्जा को ग्रहण करती है और उसका संचार महिला के शरीर में करती है।
पवित्र अग्नि : वर वधू जिस पवित्र अग्नि के चारों ओर अपने वचन लेते हैं उसका भी विशेष महत्व है। अग्नि आसपास के वातावरण को शुद्ध करती है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है व सकारात्मकता फैलाती है। जब लकडियाँ, घी, चावल तथा अन्य वस्तुएं इसमें डाली जाती हैं तो उस शुद्ध वातावरण में जो भी लोग उपस्थित होते हैं उनके स्वास्थ्य पर इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से उस जोड़े पर जो इसके सबसे अधिक नज़दीक होते हैं।
कान छिदवाने की परम्परा : भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है। माना जाता है कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

वर-वधु पर चावल छिड़कना : वर-वधु पर चावल छिड़कने का रिवाज काफी पुराना है। माना जाता है कि चावल को नए विवाहित जोड़े पर फेंकना बहुत शुभ होता है, इससे उन दोनों का दांपत्‍य जीवन बहुत सुखी रहता है और बुरी शक्तियां उनसे दूर रहती है।

लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रहेगा तो पूरा होगा स्वप्न..

मार्गदर्शक चिंतन-

दुनिया के महान व्यक्ति केवल इसीलिए सफल हो पाए क्योंकि प्रत्येक क्षण वो अपने उद्देश्य में, संकल्प में संलग्न रहे। अपने लक्ष्यों के प्रति हमेशा सजग रहो। कल के लिए कार्यों को कभी भी मत टालो। समय अनुकूल ना हो तो भी कर्म करना बंद मत करो। कर्म करने पर तो हार या जीत कुछ भी मिल सकती है पर कर्म ना करने पर केवल हार ही मिलती है । 
पुरुषार्थी के पुरुषार्थ के आगे तो भाग्य भी विवश होकर फल देने के लिए बाध्य हो जाता है। प्रत्येक बड़ा आदमी कभी एक रोता हुआ बच्चा था। प्रत्येक भव्य इमारत सफ़ेद पेपर पर कभी मात्र एक कल्पना थी। यह मायने नहीं रखता कि आज आप कहाँ हैं ? महत्वपूर्ण ये है कि कल आप कहाँ होना चाहते हैं ?भागीरथ तो देवलोक से गंगाजी को ले आये थे जमीन पर। समय मत गवाओ, अपने प्रयत्न जारी रखो, सफलता बाँह फैलाकर आपका स्वागत करने के लिए खड़ी है।

Wednesday, 1 February 2017

शुकदेव जी ने परीक्षित जी का कैसे दूर किया मृत्यु का भय..

?|| मृत्यु से भय कैसा ||?
राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए
जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और
तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष
रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु
का भय दूर नहीं हुआ।
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन
क्षुब्ध हो रहा था।
तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा
सुनानी आरंभ की।
राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी
जंगल में शिकार खेलने गया।
संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा
पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी
वर्षा पड़ने लगी।
जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत
डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में
रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने
लगा।
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक
दिखाई दिया।
.
वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी ।
वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था,इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने
का स्थान बना रखा था।
अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी
की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी
और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी।
उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका,लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न
देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर
जाने देने के लिए प्रार्थना की।
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बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ,लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।
इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर
वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने
की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे
झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।।
इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता।
मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस
झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो
बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है,सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है।
बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह
होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर
देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।
राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में
झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि
सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने
जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास
करने की बात सोचने लगा।
वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस
पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा
कहने लगा।
राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और
दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा
हो गया।
कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से
पूछा," परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान
पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ?
"
परीक्षित ने उत्तर दिया," भगवन् ! वह कौन राजा
था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी
मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी
प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य
भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है।
उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। "श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा," हे राजा
परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।
इस मल-मूल की गठरी देह ( शरीर ) में जितने समय
आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि
तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक
जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट
फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी
मूर्खता नहीं है ?"राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन
मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
मेरे भाई - बहनों, वास्तव में यही सत्य है।
जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो
अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना
करता है कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ ( इस कोख ) से मुक्त
कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा।
और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो ( उस
राजा की तरह हैरान होकर ) सोचने लगता है कि मैं
ये कहाँ आ गया ( और पैदा होते ही रोने लगता है )फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की
खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक
उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।
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यही मेरी भी कथा है और आपकी भी।

महापुरुषों के आदेश का पालन करने से होगा लाभ..

मार्गदर्शक चिंतन-

महापुरुषों को केवल पूजो नहीं अपितु उनसे प्रेरणा भी ली जानी चाहिए। क्योंकि वास्तविकता में महापुरुषों का जीवन वंदना के लिए नहीं कुछ बनने के लिए प्रेरणा होता है।
जबसे समाज ने महापुरुषों से पवित्र, मर्यादित, अनुशासित और शुचितापूर्ण जीवन की प्रेरणा लेने की वजाय उन्हें पूजना प्रारंभ कर दिया तबसे पुजारी तो कई बन गये पर कोई पूज्य ना बन सका। जिसके संग से हमारा मोह भंग हो जाए और कृष्ण प्रेम का रंग चढ़ जाए, वही तो संत है।
महापुरुषों के चरण नहीं उनका आचरण पकड़ो ताकि हमारा आचरण उच्च बन सके। देहालय शिवालय बन सके। मनुष्यता के गुण हममें आ सकें। वक्तव्य पकड़ना चाहिए वक्ता नहीं, नहीं तो व्यक्ति पूजा शुरू हो जाएगी। आसक्ति गुणों को ग्रहण करने में हो ना कि गुणवान व्यक्ति में ही आसक्ति हो जाए।