Thursday, 8 December 2016

जानिए भावनाओँ से कैसे बदलता है भाग्य..

भावनाओं से ही तय होता है मनुष्य का भाग्य

दो मित्र गांव से नगर घूमने आए। रास्ते में चलते- चलते एक जगह उन्होंने देखा भागवत का पाठ चल रहा है। एक ने कहा चलो थोड़ी देर यहां बैठकर भागवत की कथा सुन लें। दूसरा बोला- नहीं भाई, भागवत सुनकर क्या होगा? चलो नर्तकी के यहां थोड़ा नाच गाने का लुफ्त उठाएं।
इस पर पहला मित्र राजी नहीं हुआ और अकेला ही भागवत सुनने चला गया। दूसरा मित्र नर्तकी के घर जा पहुंचा। पर वहां जाकर उसका मन विचलित हुआ। थोड़ी ही देर में उसके मन में विरक्ति आई और वह सोचने लगा- मुझे धिक्कार है। मै यहां क्यों आया। मेरा दोस्त वहां भगवान की कल्याणकारी बातें सुन रहा है और मै यहां कहां आ पड़ा हूं। इधर, पहला मित्र भागवत सुनने तो बैठ गया परंतु वह मन ही मन सोच रहा था कि मै कैसा मूर्ख हूं। यह पंडित ना जाने क्या क्या बोल रहा है और मै यहां बैठा हुआ हूं। मै अपने दोस्त के साथ क्यों नहीं गया। मेरा मित्र इस समय मौज कर रहा होगा।
सहसा तभी उस नगर में भूंकप आया और एक ही साथ दोनों मित्रों की मृत्यु हो गई। अब जो भागवत सुन रहा था उसे यमदूत ले गए और जो नर्तकी के घर गया था, उसे विष्णु दूत बैकुंठ ले गए क्योंकि भगवान भावग्रही है। वे व्यक्ति का मन देखते है। कौन क्या कर रहा है, कहां पड़ा हुआ है ये नहीं देखते। जैसा भाव होता है वैसा लाभ भी होता है।
#सार- मन की भावनाएं मनुष्य के भाग्य का निर्माण करती है। आडंबर करने वाले कभी वास्तविकता का सुख नहीं पाते। 

क्या है महारास का रहस्य...

मार्गदर्शक चिंतन-शरद पूर्णिमा वह पावन दिवस जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में असंख्य गोपिकाओं के साथ "महारास" रचाया था। शास्त्रों में कहा गया कि "रसो वै स:" अर्थात परमात्मा रसस्वरूप है अथवा जो रस तत्व है, वही परमात्मा है।
श्रीकृष्ण द्वारा उसी आनंद रूप रस का गोपिकाओं के मध्य वितरण ही तो "रास" है। यानि एक ऐसा महोत्सव जिसमें स्वयं ब्रह्म द्वारा जीव को अपने ब्रह्म रस में डुबकी लगाने का अवसर प्रदान किया जाता है। जीवन के अन्य सभी सांसारिक रसों का त्याग कर जीव द्वारा ब्रह्म के साथ ब्रह्मानन्द के आस्वादन का सौभाग्य ही "महारास" है। 
काम तभी तक जीव को सताता है जब तक जीव जगत में रहे, जगदीश की शरण लेते ही उसका काम स्वतः गल जाता है। अतः "महारास" जीव और जगदीश का मिलन ही है। इसीलिए श्रीमद् भागवत जी में कहा गया कि जो काम को मिटाकर राम से मिला दे, वही "महारास" है।

Wednesday, 7 December 2016

कैसे बनता है आम आदमी...महान..

उद्देश्यों की पवित्रता से मिलती है महानता..

कान्यकुब्ज देश के राजा कौशिक एक दिन अपने दल-बल समेत आखेट के लिए वन की ओर गए। लौटते समय वशिष्ट ऋषि के आश्रम में कौशिक का ठहरना हुआ। राजा और उनकी विशाल सेना की वशिष्ठ ने भरपूर आवभगत की। कौशिक को आश्चर्य हुआ कि इन घने जंगल में एक त्यागी- तपस्वी ऋषि के पास इतने साधन कहां से आए। पूछने पर वशिष्ट ने अपनी नंदिनी गाय के बारे में बताया। हर इच्छा की पूर्ति करने वाली ये गाय की अधिक उपयोगिता है, इसलिए आप इसे मुझे दे दीजिए और बदले में जो मांग लीजिए। वशिष्ट ने इंकार कर दिया। कौशिक अपनी सेना के बल पर नंदिनी को छीनने की योजना बनाने लगे। ये देख नंदिनी ने अपनी सेना खड़ी की और कौशिक को हरा दिया। पराजय से अपमानित कौशिक राज-पाट त्यागकर तपस्या करने लगे। घोर तप के बाद उन्होंने भगवान शंकर से अग्नि अस्त्र पाया और फिर वशिष्ट के आश्रम पर हमला कर दिया। इस बार ऋषि के ब्रह्मदंड ने उसे हराया।
भगवान शंकर के दिए अस्त्र को भी नाकाम करने वाले वशिष्ठ की श्रेष्ठता का तब कौशिश को अहसास हुआ। वे पुन: तपस्या करने चल पड़े। उन्होंने घोर तप कर अपनी वासना और क्रोध पर विजय प्राप्त की और सात्विक गुणों को प्राप्त किया। कौशिक में आए इस सकारात्मक बदलाव से प्रसन्न होकर वशिष्ट ने उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि से विभूषित किया। यही राजा आगे चलकर महार्षि विश्वामित्र कहलाए और त्रेतायुग में भगवान श्रीराम व लक्ष्मण के गुरु बने।
शिक्षा- जब मन निर्मल हो और साधना के उद्देश्य पवित्र हो तो इंसान महामानव बन जाता है। उसका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज होता है और वे आदर्श की एक मिसाउद्देश्यों की पवित्रता से मिलती है महानता
कान्यकुब्ज देश के राजा कौशिक एक दिन अपने दल-बल समेत आखेट के लिए वन की ओर गए। लौटते समय वशिष्ट ऋषि के आश्रम में कौशिक का ठहरना हुआ। राजा और उनकी विशाल सेना की वशिष्ठ ने भरपूर आवभगत की। कौशिक को आश्चर्य हुआ कि इन घने जंगल में एक त्यागी- तपस्वी ऋषि के पास इतने साधन कहां से आए। पूछने पर वशिष्ट ने अपनी नंदिनी गाय के बारे में बताया। हर इच्छा की पूर्ति करने वाली ये गाय की अधिक उपयोगिता है, इसलिए आप इसे मुझे दे दीजिए और बदले में जो मांग लीजिए। वशिष्ट ने इंकार कर दिया। कौशिक अपनी सेना के बल पर नंदिनी को छीनने की योजना बनाने लगे। ये देख नंदिनी ने अपनी सेना खड़ी की और कौशिक को हरा दिया। पराजय से अपमानित कौशिक राज-पाट त्यागकर तपस्या करने लगे। घोर तप के बाद उन्होंने भगवान शंकर से अग्नि अस्त्र पाया और फिर वशिष्ट के आश्रम पर हमला कर दिया। इस बार ऋषि के ब्रह्मदंड ने उसे हराया।
भगवान शंकर के दिए अस्त्र को भी नाकाम करने वाले वशिष्ठ की श्रेष्ठता का तब कौशिश को अहसास हुआ। वे पुन: तपस्या करने चल पड़े। उन्होंने घोर तप कर अपनी वासना और क्रोध पर विजय प्राप्त की और सात्विक गुणों को प्राप्त किया। कौशिक में आए इस सकारात्मक बदलाव से प्रसन्न होकर वशिष्ट ने उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि से विभूषित किया। यही राजा आगे चलकर महार्षि विश्वामित्र कहलाए और त्रेतायुग में भगवान श्रीराम व लक्ष्मण के गुरु बने।
शिक्षा- जब मन निर्मल हो और साधना के उद्देश्य पवित्र हो तो इंसान महामानव बन जाता है। उसका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज होता है और वे आदर्श की एक मिसाल बन जाता है।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

कहां है दुनिया का स्वर्ग...

मार्गदर्शक चिंतन-

यह दुनियाँ अगर नरक है तो केवल उनके लिए जो नारायण को भूले हुए हैं। यह दुनियाँ स्वर्ग अवश्य है मगर वो भी केवल उनके लिए जिनका प्रभु से प्रेम रुपी सम्बन्ध बन चुका है। जिसे प्रभु की सत्ता पर जितना कम विश्वास होगा वह उतना ही दुखी होगा।
हमारा सुख इस बात पर निर्भर नही करता कि हमारे पास कितनी सम्पत्ति है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे पास कितनी सन्मति है। स्वर्ग का अर्थ वह स्थान नही जहाँ सब सुख हों अपितु वह स्थान है जहाँ सभी खुश रहते हों।
भक्ति हमें सम्पत्ति तो नहीं देती पर प्रसन्नता जरुर देती है। प्रसन्नता से बढकर कोई स्वर्ग नही और निराशा से बढकर दूसरा कोई नरक भी तो नही है।

Tuesday, 6 December 2016

जानिए गणेश जी की गर्दन कटने की सच्ची कथा..

 गणेश जी पर शनि की दृष्टि...
एक बार कैलाश पर्वत पर, महायोगी सूर्यपुत्र शनैश्चर शंकरनंदन गणेश को देखने के लिए आये। उनका मुख अत्यंत नम्र था, आंखें कुछ मुंदी हुई थीं और मन एकमात्र श्रीकृष्ण में लगा हुआ था, अत: वे बाहर - भीतर श्रीकृष्ण का स्मरण कर रहे थे। वे तप: फल को खाने वाले, तेजस्वी, धधकती हुई अग्नि की शिखा के समान प्रकाशमान, अत्यंत सुंदर, श्यामवर्ण और पीतांबर धारण किए हुए थे। उन्होंने वहां पहले विष्णु, ब्रह्मा, शिव, धर्म, सूर्य, देवगणों और मुनिवरों को प्रणाम किया। फिर उनकी आज्ञा से वे उस बालक को देखने के लिए गये। भीतर जाकर शनैश्चर ने सिर झुकाकर पार्वती देवी को नमस्कार किया। उस समय वे पुत्र को छाती से चिपटाये रत्नसिंहासन पर विराजमान हो आनंदपूर्वक मुस्करा रही थीं। पांच सखियां निरंतर उन पर श्वेत चंवर डुलाती जाती थीं। वे सखी द्वारा दिये गये सुवासित तांबूल को चबा रही थीं। उनके शरीर पर वह्निशुद्ध स्वर्णिम साड़ी शोभायमान थी। रत्नों के आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। सहसा सूर्यनंदन शनैश्चर को सिर झुकाये देखकर पार्वती जी ने उन्हें शीघ्र ही शुभाशीर्वाद दिया और उनका कुशल मंगल पूछा - ‘ग्रहेश्वर ! इस समय तुम्हारा मुख नीचे की ओर क्यों झूका हुआ है तथा तुम मुझे अथवा इस बालक की ओर देख क्यों नहीं रहे हो ?’शनैश्चर ने कहा - ‘शंकरवल्लभे! मैं एक परम गोपनीय इतिहास, यद्यपि वह लज्जाजनक तथा माता के समक्ष कहने योग्य नहीं है, तथापि आपसे कहता हूं, सुनिये। मैं बचपन से श्रीकृष्ण का भक्त था। मेरा मन सदा एकमात्र श्रीकृष्ण के ध्यान में ही लगा रहता था। मैं विषयों से विरक्त होकर निरंतर तपस्या में रत रहता था। पिताजी ने चित्ररथ की कन्या से मेरा विवाह कर दिया। वह सती - साध्वी नारी अत्यंत तेजस्विनी तथा सतत तपस्या में रत रहने वाली थी। एक दिन ऋतु स्नान करके वह मेरे पास आयी। उस समय मैं भगवच्चरणों का ध्यान कर रहा था। मुझे बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं था। अत: मैं उसकी ओर देखा भी नहीं। पत्नी ने अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर मुझे शाप दे दिया कि ‘तुम अब जिसकी ओर दृष्टि डालोगे, वहीं नष्ट हो जाएगा।’ तदनंतर जब मैं ध्यान से विरत हुआ, तब मैंने उस सती को संतुष्ट किया, परंतु अब तो वह शाप से मुक्त कराने में असमर्थ थी, अत: पश्चाताप करने लगी। माता ! इसी कारण मैं किसी वस्तु को अपने नेत्रों से नहीं देखता और तभी से मैं जीवहिंसा के भय से स्वाभाविक ही अपने मुख को नीचे किये रहता हूं।’ शनैश्चर की बात सुनकर पार्वती हंसने लगीं। शनैश्चर का वचन सुनकर पार्वती जी ने परमेश्वर श्रीहरि का स्मरण किया और इस प्रकार कहा - ‘सारा जगत ईश्वर की इच्छा के वशीभूत ही है।’ फिर दैववशीभऊता पार्वती देवी ने कौतूहलवश शनैश्चर से कहा - ‘तुम मेरी तथा मेरे बालक की ओर देखो। भला, इस निषेक (कर्मफलभोग) को कौन हटा सकता है ?’ तब पार्वती का वचन सुनकर शनैश्चर स्वयं मन ही मन यों विचार करने लगे - ‘अहो ! क्या मैं इस पार्वती नंदन पर दृष्टिपात करूं अथवा न करूं ? क्योंकि यदि मैं बालक को देख लूंगा तो निश्चय ही उसका अनिष्ट हो जाएगा ।’ इस प्रकार कहकर धर्मात्मा शनैश्चर ने धर्म को साक्षी बनाकर बालक को तो देखने का विचार किया, परंतु बालक की माता को नहीं। शनि की दृष्टि पड़ते ही शिशु का मस्तक धड़ से अलग हो गया। तब शनैश्चर ने अपनी आंख फेर ली और फिर वे नीचे मुख करके खड़े हो गये। इसके पश्चात उस बालक का खून से लथपथ हुआ सारा शरीर तो पार्वती की गोद में पड़ा रह गया। परंतु मस्तक अपने अभीष्ट गोलोक में जाकर श्रीकृष्ण में प्रविष्ट हो गया। यह देखकर पार्वती देवी बालक को छाती से चिपटाकर फूट फूट कर विलाप करने लगीं और उन्मत्त की भांति भूमि पर गिरकर मूर्च्छित हो गयीं। तब वहां उपस्थित सभी देवता, देवियां, पर्वत, गंधर्व, शिव तथा कैलाश वासी जन यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उस समय उनकी दशा चित्रलिखित पुत्तलिका के समान जड़ हो गयी। 
इस प्रकार उन सबको मूर्च्छित देखकर श्रीहरि गरुड पर सवार हुए और उत्तरदिशा में स्थित पुष्पभद्रा के निकट गये। वहां उन्होंने पुष्पभद्रा नदी के तट पर वन में स्थित एक गजेंद्र को देखा, जो निद्रा के वशीभूत हो बच्चों से घिरकर हथिनी के साथ सो रहा था। उसका सिर उत्तर दिशा की ओर था, मन परमानंद से पूर्ण था और वह परिश्रम से थका हुआ था। फिर तो श्रीहरि ने शीघ्र ही सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट लिया और रक्त से भीगे हुए उस मनोहर मस्तक को बड़े हर्, के साथ गरुड पर रख लिया। गज के कटे हुए अंह के गिरने से हथिनी की नींद टूट गयी। तब अमंगल शब्द करती हुई उसने अपने शावकों को भी जगाया। फिर वह शोक से विह्वल हो शावकों के साथ विलख - विलखकर चित्कार करने लगी। तत्पश्चात् उसने भगवान विष्णु का स्तवन किया। उसकी स्तुति प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वर दिया और दूसरे गज का मस्तक काटकर इसके धड़ से जोड़ दिया। फिर उन ब्रह्मवेत्ता ने ब्रह्मज्ञान से उसे जीवित कर दिया और उस गजेंद्र के सर्वांग में अपने चरणकमल का स्पर्श कराते हुए कहा - ‘गज! तू अपने कुटुंब के साथ एक कल्पपर्यन्त जीवित रह।’ इस प्रकार कहकर मन के समान वेगशाली भगवान कैलाश पर जा पहुंचे। 
वहां पार्वती के वासस्थान पर आकर उन्होंने उस बालक को अपनी छाती से चिपटा लिया और उस हाथी के मस्तर को सुंदर बनाकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। फिर ब्रह्मस्वरूप भगवान ने ब्रह्मज्ञान से हुंकारोच्चारण किया और खेल - खेल में ही उसे जीवित कर दिया। पुन: श्रीकृष्ण ने पार्वती को सचेत करके उस शिशु को उनकी गोद में रख दिया और आध्यात्मिक ज्ञानद्वारा पार्वती को समझाना आरंभ किया। श्रीविष्णु का कथन सुनकर पार्वती का मन संतुष्ट हो गया। तब वे उन गदाधर भगवान को प्रणाम करके शिशु को दूध पिलाने लगीं। तदनंतर प्रसन्न हुई पार्वती ने शंकर जी की प्रेरणा से अंजलि बांधकर भक्तिपूर्वक उन कमलापति भगवान विष्णु की स्तुति की ।




क्या है सज्जन आदमी की पहचान..

मार्गदर्शक चिंतनसज्जन आदमी का मतलब वो नही जो झूठ सह लेता हो अपितु वो जरुर है जो झूठ की सह (पक्ष) नहीं लेता हो। अधिकांशतया एक खामोश रहने वाले इंसान को दुनियाँ द्वारा सज्जन आदमी का दर्जा दे दिया जाता है। लेकिन जो खामोश रहे वो सज्जन नही अपितु असत्य के प्रतिकार का जिसके अन्दर जोश रहे वही सज्जन है।
जो सरलता असत्य का विरोध न कर सके वह समाज व स्वयं दोनों के लिए बड़ी ही घातक है। अगर झूठ और अन्याय को सह लेना ही सरलता होती तो फिर भगवान् राम को कभी भी " शील संकोच सिन्धु रघुराई "" न कहा जाता।
श्रीराम सरल अवश्य थे लेकिन केवल सुग्रीव के लिए, बालि के लिए नही, केवल अहिल्या के लिए, ताड़का के लिए नही, केवल विभीषण के लिए, रावण के लिए कदापि नही।

Monday, 5 December 2016

जानिए कौन हैं ब्रह्मा जी...क्या है ब्रह्मा जी के स्वरुप का रहस्य..

ब्रह्मा कौन है?
इस चित्रण में ब्रह्मा को एक इंसान के रूप बनाया गया था, या भारतीय प्राचीन ऋषियों द्वारा मानव जाति के लिए इस ब्रह्मांडीय चेतना की रचनात्मक योग्यता को समझने के लिए यह चित्र नियोजित किया गया था। हम इस चित्रण के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करते हैं:
1.
ब्रह्मा और ॐ - निरपेक्ष सर्वव्यापी सत्ता की रचनात्मक योग्यता (ब्रह्मा) का ओम - ॐ प्रतिनिधित्व करता है और स्पंदन की प्रथम दिव्य अभिव्यक्ति है।
2.
ब्रह्मा के चार सिर - अर्थात सर्वव्यापी आत्मा की रचनात्मकता हर जगह यानि चारों दिशाओं में व्याप्त एवं प्रचलित है।
3.
सरस्वती ब्रह्मा की पुत्री और पत्नी, दोनों हैं - अर्थात ज्ञान एवं प्रज्ञा रूपी पुत्री की उत्पत्ति ब्रह्मा से होती है और वह अविभाज्य हैं, अर्थात पत्नी भी है। व्यक्ति को ज्ञान के बिना ब्रह्मस्वरूप प्राप्त नहीं होता। प्रज्ञा प्रज्जवलित हुए बिना ब्रह्मा को धारण नही किया जा सकता।
4.
ब्रह्मा का विष्णु की नाभि से जन्म - अर्थात सर्वव्यापी परमेश्वर की रचनात्मक योग्यता, हिरण्यगर्भ से प्रक्षेपित होती है।
5.
ब्रह्मा सहत्रकमल पर बैठते हैं - अर्थात ब्रह्मज्ञान वहीं विराजमान होता है, जो ५ ज्ञानेन्द्रियों तथा ५ कर्मेन्द्रियों और उनमें से प्रत्येक के 100 उप कार्यों (10*100=1000) के परे पहुँच गया है और प्रज्ञा द्वारा ब्रह्मस्थिति को प्राप्त है।
6.
ब्रह्मा द्वारा वेदों को थामना - अर्थात वैदिक ज्ञान अथवा आत्मिक ज्ञान का कभी नाश नही हो सकता क्योंकि ब्रह्म ही उसका सरंक्षक है।
7.
श्वेत हंस ही ब्रह्मा का वाहन - दागरहित दैवीय शुद्धता ही ब्रह्मस्थिति का वाहन है।
8.
ब्रह्मा की पूजा का प्रचलन न होना - मनुष्य के लिए पारब्रह्म परमेश्वर की उपलब्धि संभव है, अतः स्पंदनरहित परमात्मा की प्राप्ति को ही परम पूज्यनीय माना गया है, यद्यपि ब्रह्मा के गिनेचुने मन्दिर हैं।
9.
ब्रह्मा के १० मानस पुत्र (प्रजापति) - अर्थात मानस स्पंदन की उत्पत्ति ॐ यानि प्रणव के उपरान्त होती है और यह मन अपनी १० मूलभूत आवृत्तियों से मनुष्य जाति का भौतिक सृष्टि में प्रादुर्भाव करता है।मनुष्य की उत्पत्ति वानर योनि के क्रमविकास से नही हुयी है।
10.
ब्रह्मा का कमण्डल और उनका माला धारण करना - कमण्डल मानसिक सन्यास का प्रतीक है; और माला जप का प्रतीक है।
11.
ब्रह्मा की दाढ़ी, किन्तु विष्णु और शिव की नही - अर्थार्त सृष्टिचक्र दीर्घायु तो है पर काल के परे नही, स्पदंनीय द्व्दं का एकात्म होना सुनिश्चित है। यही लीला है।
12.
ब्रह्मा, ब्रह्म और ब्राह्मण - ब्रह्मा अर्थात सृष्टि रचयिता एवं निरतंर स्पदंनशील सृष्टिचक्र , ब्रह्म अर्थात परमात्मा रूपी आत्मा और ब्राह्मण मतलब जो सत्-चित्-आनन्द परमेश्वर के आनन्द स्वरूप में साधना द्वारा लीन हो मुक्तः बन गया हो।जो अपने को जन्म से ब्राम्हण मानते हैं, वह मिथ्या अहम् से ग्रस्त हैं। हर वो मनुष्य जो ब्रह्म पूर्णरूप से धारण कर चुका है, सर्वप्रेमी होता है।