Thursday, 7 December 2017

किस तरह की हो जीवन में विचारधारा...

मार्गदर्शक चिंतन-

इस दुनिया में सदैव ही दो तरह की विचारधारा के लोग जीते हैं। एक इस दुनिया को निःसार समझकर इससे दूर और दूर ही भागते हैं। दूसरी विचारधारा वाले लोग इस दुनिया से मोहवश ऐसे चिपटे रहते हैं कि कहीं यह छूट ना जाए। कुछ इसे बुरा कहते हैं तो कुछ इसे बूरा (मीठा) कहते हैं।
भगवान् वुद्ध कहते हैं जीवन एक वीणा की तरह है। वीणा के तारों को ढीला छोड़ेगो तो झंकार ना निकलेगी और ज्यादा खींच दोगे तो वो टूट जायेंगे। मध्यम मार्ग श्रेष्ठ है , ना ज्यादा ढीला और ना ज्यादा खिचाव।
अपनी जीवन रूपी वीणा से सुख - आनंद की मधुर झंकार निकले इसलिए अपने इन्द्रिय रुपी तारों को ना इतना ढीला रखो कि वो निरंकुश और अर्थहीन हो जाएँ और ना इतना ज्यादा कसो कि वो टूटकर आनंद का अर्थ ही खो बैठें। जिसे मध्यम मार्ग में जीना आ गया वो सच में आनंद को उपलब्ध हो जाता है

Wednesday, 6 December 2017

जानिए क्या है भगवान कृष्ण में विशिष्टता..

मार्गदर्शक चिंतन-

विशिष्टता में शिष्टता, महानता में सहजता, उच्चता में उदारता, विषमता में समता, व्यवहार में मृदुता व प्रतिकूलताओं में धैर्य, यही तो कृष्ण होने की परिभाषा है। जीवन की सम्पूर्णता का नाम ही तो कृष्ण है।जीवन की ऐसी कोई सम्भावना नहीं जो कृष्ण में आकर पूर्ण न हुई हो।
युद्ध के मैदान में शस्त्रकार, कुरुक्षेत्र के मैदान में शास्त्रकार तो असंख्य गोपियों के मध्य में नृत्यकार की भूमिका निभाना उनके बहु आयामी व्यक्तित्व को ही दर्शाता है। कृष्ण अर्थात एक ऐसा जीवन जहाँ न पाने का निषेध है न खोने का भय।
जहाँ न राजसी सुखों का परित्याग है न विलासिता की इच्छा और जहाँ न किसी से द्वेष है न अपनों का मोह। कृष्ण न बन सको कोई बात नहीं कृष्ण के बन जाओ 

Tuesday, 5 December 2017

कैसा हो कर्म का उद्देश्य..

मार्गदर्शक चिंतन-

भगवान् श्री कृष्ण एक तरफ वंशीधर हैं तो दूसरी तरफ चक्रधर, एक तरफ माखन चुराने वाले हैं तो दूसरी तरफ सृष्टि को खिलाने वाले। वो एक तरफ वनवारी हैं तो दूसरी तरफ गिरधारी, वो एक तरफ राधारमण हैं तो तो दूसरी तरफ रुक्मणि हरण करने वाले हैं।
कभी शांतिदूत तो कभी क्रांतिदूत, कभी यशोदा तो कभी देवकी के पूत। कभी युद्ध का मैदान छोड़कर भागने का कृत्य , तो कभी सहस्र फन नाग के मस्तक पर नृत्य। जीवन को पूर्णता से जीने का नाम कृष्ण है। जीवन को समग्रता से स्वीकार किया श्री कृष्ण ने। परिस्थितियों से भागे नहीं उन्हें स्वीकार किया। 
भगवान श्री कृष्ण एक महान कर्मयोगी थे, उन्होंने अर्जुन को यही समझाया कि हे अर्जुन, माना कि कर्म थोड़ा दुखदायी होता है लेकिन बिना कर्म किये सुख की प्राप्ति भी नहीं हो सकती। अगर कर्म का उद्देश्य पवित्र व शुभ हो तो वही कर्म सत्कर्म बन जाता है।

Monday, 4 December 2017

जानिए क्या है भगवान कृष्ण का स्वरुप..

मार्गदर्शक चिंतन-

जिसे सीमित शब्दों में परिभाषित किया जा सके वो कभी भी कृष्ण नहीं हो सकता क्योंकि कृष्ण होने का अर्थ ही यह है कि जिसके लिए सारे शब्द कम पड़ जाएं व सारी उपमाएं छोटी। जो दूसरों के चित्त को अपनी ओर आकर्षित करे वो श्रीकृष्ण है।
बाल भाव से बच्चे उनकी तरफ खिंचते हैं तो प्रौढ़ गाम्भीर्य भाव से। कान्त भाव से गोपियाँ उनको अपना सर्वस्व दे बैठीँ तो योगिराज बनकर उन्होंने योगियों को अपना बनाया। केवल बाहर ही नहीं अपितु हमें अपने भीतर भी कृष्ण को जन्म देना होगा।
अनीति व अत्याचार के विरोध की सामर्थ्य, कठिनतम परिस्थितियों में भी धर्म रक्षार्थ कृत संकल्प, पग - पग पर अधर्म को चुनौती देने का साहस व प्रत्येक कर्म का पूर्ण निष्ठा से निर्वहन, वास्तव में अपने भीतर कृष्ण को जन्म देना ही है।

Sunday, 3 December 2017

जीवन में किससे लें प्रेरणा..

मार्गदर्शक चिंतन-

जीवन का प्रेरणा दायक बनना बहुत अच्छी बात है मगर बिना प्रेरणा लायक बने यह कैसे संभव हो सकता है ? हम दूसरों को प्रेरणा दें उससे पूर्व यह आवश्यक हो जाता है कि हम दूसरों से प्रेरणा भी लें।
प्रेरणा पर्वत से लेनी चाहिए जिसके मार्ग में अनेक आंधी और तूफान आते हैं मगर उसके स्वाभिमान मस्तक को नहीं झुका पाते। प्रेरणा लहरों से लेनी चाहिए जो गिरकर फिर उठ जाती हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचे बगैर रूकती नहीं। प्रेरणा बादलों से लेनी चहिये जो समुद्र से जल लेते हैं और रेगिस्तान में बरसा देते हैं।
प्रेरणा हमें वृक्षों से लेनी चाहिए, फल लग जाने के बाद जिनकी डालियाँ स्वतः झुक जाया करती हैं। प्रेरणा उन फूलों से भी लेनी चाहिए जो खिलते भी दूसरों के लिए और टूटते भी दूसरों के लिए हैं। जो व्यक्ति प्रेरणा लेना जानता है उसका जीवन एक दिन स्वतः प्रेरणा दायक भी बन जाता है।

Thursday, 30 November 2017

जीवन में कैसी हो..शर्म...

मार्गदर्शक चिंतन-

शर्म से जिन्दगी जिओ मगर शर्म की जिन्दगी नहीं। परस्पर सम्मान पूर्वक व्यवहार करते हुए, सबसे विनम्रता पूर्वक आचरण रखना और अपने से बड़ों के साथ नीची आवाज में बात करना, इसी का नाम तो शर्म से जिन्दगी जीना है।
इसके ठीक विपरीत अपने दुष्कृत्यों द्वारा समाज में तिरष्कृत रहना अथवा अपने दुर्व्यवहार व दुश्चरित्र के कारण पग-पग पर अपमानित रहना, ऐसी जिन्दगी जीना ही शर्म की जिन्दगी जीना है। विनय ही जीवन में विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।
जो लोग शर्म से तथा विनय पूर्वक जीना जानते हैं , सफलता उनके द्वार को अवश्य खटखटाया करती है। स्वयं शर्म करना अच्छी बात है मगर दूसरे तुम पर शर्म करें ऐसे कर्म करने से बचना ही जीवन की महानता है।

Wednesday, 29 November 2017

जानिए कौन है सन्यासी और योगी...

मार्गदर्शक चिंतन-


गीता जी में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के समक्ष सन्यासी और योगी की जो परिभाषा रखी है, वह बड़ी ही अदभुत और विचारणीय है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन सन्यास आवरण का नहीं अपितु आचरण का विषय है।
जिह्वा क्या बोल रही यह सन्यासी होने की कसौटी नहीं अपितु जीवन क्या बोल रहा है, यह अवश्य ही सन्यासी और योगी होने की कसौटी है।
अनाश्रित: कर्म फलं कार्यं कर्म करोति य:स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चा क्रिया।

जो पुरुष कर्म फल की इच्छा का त्याग कर सदैव शुभ कर्म करता रहता है, परोपकार ही जिसके जीवन का ध्येय है, वही सच्चा सन्यासी है। कर्मों का त्याग सन्यास नहीं, अपितु अशुभ कर्मों का त्याग सन्यास है। दुनियाँ का त्याग करना सन्यास नहीं है अपितु दुनियाँ के लिए त्याग करना यह अवश्य सन्यास है।