Sunday, 2 July 2017

चंचल मन को कहां ले जाएं..

मार्गदर्शक चिंतन-

चित्त और वित्त की स्थिति लगभग एक जैसी है। चित्त अर्थात मन को काबू में में रखना असम्भव सा है वैसे ही धन को भी मुट्ठी में बंद कर नहीं रखा जा सकता। 
हमारा मन वहीँ ज्यादा जाता है जहाँ हम इसे रोकना चाहते हैं। इसीलिए ही कहा गया है कि मन के लिए निषेध ही निमंत्रण का काम करता है। जहाँ से हटाना चाहोगे यह उसी तरफ भागेगा। 
ठीक ऐसे ही धन जब आता है तो शांति भी बाहर की और भागने लगती है। धन के साथ-साथ स्वयं की शांति और परिवार का सदभाव बना रहे, यह थोड़ा मुश्किल काम है।
चित्त और वित्त दोनों चंचल हैं, दोनों जायेंगे ही, इसलिए दोनों को जाने भी दो मगर कहाँ ? जहाँ सत्संग हो , परोपकार हो, जहाँ प्रभु का द्वार हो और जहाँ से हमारा उद्धार हो।

Saturday, 1 July 2017

दुनिया की परवाह किए बिना करें ईमानदारी से कर्म

मार्गदर्शक चिंतन-

ये दुनियाँ भी बड़ी अजीब है, सच को देखकर भी स्वीकार नहीं करती है और झूठ से सुनकर ही सहमत हो जाती है। यहाँ पर जब किसी के द्वारा कोई अच्छा काम किया जाता है, तो ये दुनियाँ वाले कहते हैं कि , विश्वास ही नहीं होता कि उसने ये काम कैसे कर लिया?लेकिन अगर किसी पर गलत काम करने का आरोप लगाया जाता है तो यही लोग कहते हैं, हमें पूरा विश्वास है उसने ऐसा किया ही होगा। इस दुनियाँ की समस्या मात्र यह नहीं है, कि यह अच्छा काम नहीं करती अपितु यह भी है, कि यह अच्छे को स्वीकार करने का साहस भी नहीं रखती।
इसलिए अगर आप दुनियाँ की परवाह करोगे तो आप से अच्छे काम नहीं हो पाएंगे मगर यदि आपको अच्छे काम करने ही हैं तो फिर आपको दुनियां की परवाह तो छोड़नी ही पड़ेगी।

Wednesday, 28 June 2017

समय का सदुपयोग करें..

मार्गदर्शक चिंतन-

अपने काम को समय पर करने की आदत बनाओ क्योंकि आप घडी तो खरीद सकते हो मगर समय को नहीं। आप सिर्फ घड़ी को अपने हाथों में बाँध सकते हैं, वक्त को कदापि नहीं। वक़्त को कोई नहीं रोक पाया। 
घड़ी भले ही पीछे भी हो सकती है मगर वक्त पीछे नहीं हो सकता और घड़ी तो बंद भी हो जाती है मगर उससे समय चक्र नहीं बंद हो जाता। वक़्त का सम्मान ना करने वाले का एक दिन वक़्त भी सम्मान नहीं करता है। 
अतः याद रखना कि काम समय पर ही पूरा किया जाये क्योंकि घड़ी भले ही आपकी हो मगर वक्त अपनी चाल से चलता है किसी और की चाल से नहीं। दुनिया में कोई भी ऊँचे मुकाम पर पहुंचा है तो मेहनत और समय बद्धता के कारण। कोई भी कार्य हो उसकी पूरे होने की समय सीमा जरूर हो।

Tuesday, 27 June 2017

जानिए दूसरों की मदद करने से क्या लाभ होता है

मार्गदर्शक चिंतन-

किसी का सहारा मिल जाना अच्छी बात है, किन्तु किसी का सहारा बन जाना, यह उससे भी अच्छी बात है। यहाँ हर कोई दूसरों से तो सहारा चाहता है मगर दूसरों को सहारा देना नहीं चाहता।
सच्ची शान्ति के लिए एक अनुष्ठान कर लेना, वह ये कि किसी बेसहारे का सहारा बन जाना। आप आश्चर्य करोगे कि जिस आनंद और शांति के लिए हम दर- दर भटके जिसके लिए हमने तीर्थों के इतने चक्कर काटे, आखिर वह आत्मसुख बहुत सस्ते में मिल गया।
जो व्यक्ति दूसरों को सहारा देता है, उसे अपने लिए सहारा माँगना नहीं पड़ता, परमात्मा स्वतः दे देता है। किसी प्यासे को पानी पिलाने का, किसी गिरे हुए को उठाने का और किसी भूले को राह दिखाने का अवसर मिल जाये तो चूकना मत, क्योंकि ऐसा करने से आप बहुत ऋणों से मुक्त हो जाओगे।

Monday, 26 June 2017

जानिए मनुष्य में सबसे ज्यादा अशांति का कारण क्या है

मार्गदर्शक चिंतन-

मनुष्य कर्मों से अधिक अशांत नहीं है वह इच्छाओं से, वासनाओं से अधिक अशांत है। जितने भी द्वंद , उपद्रव, अशांति, और सबसे ज्यादा अराजकता कहीं है तो वह व्यक्ति के भीतर है। 
मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है। पहले कुछ मिल जाये इसलिए कर्म करता है। फिर बहुत कुछ मिल जाये इसलिए कर्म करता है। इसके बाद सब कुछ मिल जाये इसलिए कर्म करता है। उसकी यह तृष्णा कभी ख़तम नहीं होती। जहाँ ज्यादा तृष्णा है वहाँ चिंता स्वभाविक है।
जहाँ चिंता है वहाँ कैसी प्रसन्नता ? कैसा उल्लास ? यदि मनुष्य की तृष्णा शांत हो जाये , उसे जितना प्राप्त है उसी में सन्तुष्ट रहना आ जाये तो वह कभी भी अशांत नहीं रहेगा। इंसान अपने विचार और सोचने का स्तर ठीक कर ले तो जीवन को मधुवन बनते देर ना लगेगी।

Sunday, 25 June 2017

जीवन को निर्मल कैसे बनाएं

मार्गदर्शक चिंतन-

औषधि केवल रोग निवृत्ति के लिए होती है, स्वास्थ्य के लिए नहीं। स्वास्थ्य तो उपलब्ध है। साबुन से कपडे में कभी भी चमक नहीं आती, साबुन केवल कपडे पर लगी गंदगी को साफ करता है। इसी प्रकार शांति के लिए हमें कोई प्रयत्न नहीं करना, वह प्राप्त ही है। आनन्द तो नित्य है, सहज है, मिला हुआ ही है।
अशांति देने वाले, विषाद देने वाले कर्मों से हमें बचना है। जिस प्रकार रोड़ पर चलते समय हमें स्वयं गाड़ियों से बचना पड़ता है लेकिन इस नियम को हम जीवन में और बहुत जगह पर लागू नहीं करते हैं।
क्लेश की, कलह की स्थितियों से विवेकपूर्वक बचते रहो। वो उत्पन्न होंगी और रोज नए-नए रूप में आएँगी। जिस प्रकार एक कुशल नाविक तेज धार में समझदारी से अपनी नाव को किनारे लगा देता है उसी प्रकार आप भी समझदारी पूर्वक जीवन रुपी नाव को शांति और आनंद के किनारे पर रोज पहुँचाओ।

Thursday, 22 June 2017

पूरा जीवन प्रार्थना बन जाए..कुछ ऐसा करो

मार्गदर्शक चिंतन-

मौन रहकर भी सत्य मिल सकता है, बोलकर भी मिल सकता है। घर में रहकर भी मिल सकता है, घर छोड़कर भी मिल सकता है। चैतन्य देव - मीराबाई की तरह हरि बोल गाते-गाते भी मिल सकता है। तुम किसी भी मार्ग के पथिक होना पर श्रद्धा और विश्वास के पथिक जरूर होना।
सूफी परम्परा में एक बात कही जाती है कि हमारे साधन में एक ही कमी है। हम खुद तो बन जाते हैं आशिक और प्रभु को बना लेते हैं माशूका, यही तो गड़वड़ है। तुम उसे कहाँ जाओगे ढूँढने, वो तो छलिया है। अब ऐसा करो , कन्हैया को बना लो आशिक और तुम बन जाओ माशूका।
वो अपने आप तुम्हें खोजते- खोजते आ जायेगा। इस प्रकार के सत्कर्म ,परमार्थ, भजन, निष्ठा, सेवा , यज्ञ , भजन हमारा बन जाये कि हमारा ठाकुर हमें खोजते- खोजते हमारे घर आ जाये। शबरी नहीं गई थी , भगवान् शबरी के यहाँ आये थे। जीवन पूरा ही प्रार्थना बन जाये, कुछ ऐसा करो।