Thursday, 9 February 2017

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडि़त होय...

मार्गदर्शक चिंतन-

जो काम धीरे बोलकर, मुस्कुराकर और प्रेम से बोलकर कराया जा सकता है उसे तेज आवाज में बोलकर और चिल्लाकर करवाना मूर्खों का काम है। और जो काम केवल गुस्सा दिखाकर हो सकता है, उसके लिए वास्तव में गुस्सा करना यह महामूर्खों का काम हैं।
अपनी बात मनवाने के लिए अपने अधिकार या बल का प्रयोग करना यह पूरी तरह पागलपन होता है। प्रेम ही ऐसा हथियार है जिससे सारी दुनिया को जीता जा सकता है । प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है।
आज प्रत्येक घर में ईर्ष्या, संघर्ष, दुःख और अशांति का जो वातावरण है उसका एक ही कारण है और वह है प्रेम का अभाव। आग को आग नहीं बुझाती पानी बुझाता है। प्रेम से दुनिया को तो क्या दुनिया बनाने वाले तक को जीता जा सकता है। पशु -पक्षी भी प्रेम की भाषा समझते है। तुम प्रेम बाटों, इसकी खुशबू कभी ख़तम नहीं होती।

Wednesday, 8 February 2017

क्यों शेषनाग शैया पर शयन करते हैं भगवान श्रीहरि

?क्यों भगवान विष्णु सोते है सांपो के बिस्तर पर?
?जब संसार में पाप बहुत अधिक बढ़ गए थे तब भगवान विष्णु ने विश्व का उद्धार किया था. शेषनाग 'अनंत' अर्थात जिसकी कोई सीमा नहीं, का प्रतीक है. भगवान विष्णु उपयुक्त समय पर मानव जाति का मार्ग दर्शन करते हैं. यही कारण है कि उन्हें साँपों के बिस्तर पर लेटा हुआ दिखाया जाता है.
हर बार संसार को बचाने के लिए भगवान विष्णु के कई रूपों और आकारों में जन्म लिया है. हिन्दू धर्म के अनुसार शेषनाग भगवान विष्णु की उर्जा का प्रतीक हैं जिस पर वे आराम करते हैं.ऐसा माना जाता है कि शेषनाग ने अपनी कुंडली में सभी ग्रहों को पकड़ के रखा है और वे भगवान विष्णु के मन्त्रों का उच्चारण करते हैं. यदि भगवान विष्णु संपूर्ण ब्रह्मांड, ग्रहों और तारों के प्रतीक हैं तो वास्तव में यह महत्व जायज़ है.शेषनाग भगवान विष्णु को केवल आराम करने के लिए जगह ही नहीं देते बल्कि वे उनके रक्षक भी हैं. भगवान कृष्ण के जन्म के समय जब कृष्ण भगवान के पिता वासुदेव उन्हें नंद के घर ले जा रहे थे तब शेषनाग ने ही तूफ़ान से भगवान कृष्ण की रक्षा की थी. तो निश्चित रूप से वे एक रक्षक हैं.


कैसे आएगी जीवन मे संघर्ष से शांति..

मार्गदर्शक चिंतन-

माना कि जीवन का उद्देश्य परम शांति को प्राप्त करना है मगर बिना संघर्ष के जीवन में शांति की प्राप्ति हो पाना कदापि सम्भव नहीं है। शांति मार्ग नहीं अपितु लक्ष्य है। बिना संघर्ष पथ के इस लक्ष्य तक पहुँचना असम्भव है।
जो लोग पूरे दिन को सिर्फ व्यर्थ की बातों में गवाँ देते हैं वे रात्रि की गहन निद्रा के सुख से भी वंचित रह जाते हैं। मगर जिन लोगों का पूरा दिन एक संघर्ष में, परिश्रम में, पुरुषार्थ में गुजरता है वही लोग रात्रि में गहन निद्रा और गहन शांति के हकदार भी बन जाते हैं।
जीवन भी ठीक ऐसा ही है। यहाँ यात्रा का पथ जितना विकट होता है लक्ष्य की प्राप्ति भी उतनी ही आनंद दायक और शांति प्रदायक होती है। मगर याद रहे लक्ष्य श्रेष्ठ हो, दिशा सही हो और प्रयत्न में निष्ठा हो फिर आपके संघर्ष की परिणिति परम शांति ही होने वाली है।

Tuesday, 7 February 2017

जानिए कैसे गरुड़ जी बने विष्णुजी के वाहन..

।। कैसे बने गरुड़देव, विष्णु जी के वाहन ।।
भगवान विष्णु के भक्तों में गरुड़देव का स्थान अन्यतम है। क्योंकि उन्हें स्वयं भगवान की सवारी बनने का सौभाग्य प्राप्त है। 
कश्यप ऋषि और विनता के पुत्र गरुड़देव पक्षियों के राजा हैं। उन्होंने अपनी माता को दासत्व से मुक्त कराने के लिए इंद्र सहित समस्त देवताओं को युद्ध में परास्त किया और उनसे अमृत छीन लिया था। बाद में भगवान विष्णु के बीच बचाव करने के बाद उन्होंने देवताओं को वापस अमृत पाने का रास्ता बताया। 
उनकी ताकत और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने गरुड़देव से वरदान मांगने को कहा, तो गरुड़देव ने भगवान विष्णु का वाहन बनने का वरदान मांगा। जिससे श्रीहरि उनपर और ज्यादा प्रसन्न हुए और उन्हें अपने भक्तों में प्रथम स्थान दिया। 
इसीलिए कहा जाता है, कि जहां गरुड़ पर सवार श्रीहरि और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, वहां समस्त शुभत्व का निवास होता है और संपूर्ण धन धान्य और समृद्धि स्थायी रुप से निवास करती है। क्योंकि माता लक्ष्मी कभी श्रीहरि और भक्तराज गरुड़ का साथ नहीं छोड़ती हैं।



जानिए कैसे जीएं जीवन..

मार्गदर्शक चिंतन-

जीवन में बुराई अवश्य हो सकती है मगर जीवन बुरा कदापि नहीं हो सकता। जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का, श्रेष्ठ पाने का। जीवन की दुर्लभता जिस दिन किसी की समझ में आ जाएगी उस दिन कोई भी व्यक्ति जीवन का दुरूपयोग नहीं कर सकता।
जीवन वो फूल है जिसमें काँटे तो बहुत हैं मगर सौन्दर्य की भी कोई कमी नहीं। ये और बात है कुछ लोग काँटो को कोसते रहते हैं और कुछ सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं। 
जीवन को बुरा सिर्फ उन लोगों के द्वारा कहा जाता है जिनकी नजर फूलों की बजाय काँटो पर ही लगी रहती है। जीवन का तिरस्कार वे ही लोग करते हैं जिनके लिए यह मूल्यहीन है।
जीवन में सब कुछ पाया जा सकता है मगर सब कुछ देने पर भी जीवन को नहीं पाया जा सकता है। जीवन का तिरस्कार नहीं अपितु इससे प्यार करो। जीवन को बुरा कहने की अपेक्षा जीवन की बुराई मिटाने का प्रयास करो, यही समझदारी है।

Monday, 6 February 2017

जानिए क्यों किया जाता है हर धार्मिक अनुष्ठान में गोदान..

गौ दान क्यों करते हैं#गौ_दान का क्या महत्व है?

?
धर्म शास्त्रों के अनुसार मृत्योपरांत प्रत्येक जीव को परलोक यात्रा के समय एक विशेष नदी पार करनी पड़ती है जिसमें जीव अपने कर्मों के अनुसार नाना प्रकार के कष्ट सहता है।
अत: वैतरणी नदी की यात्रा को सुखद बनाने के लिए मृतक व्यक्ति के नाम वैतरणी गोदान का विशेष महत्व है। पद्धति तो यह है कि मृत्यु काल में गौमाता की पूंछ हाथ में पकड़ाई जाती है या स्पर्श करवाई जाती है। लेकिन ऐसा न होने की स्थिति में गाय का ध्यान करवा कर प्रार्थना इस प्रकार करवानी चाहिए।
?वैतरणी गोदान मंत्र
धेनुके त्वं प्रतीक्षास्व यमद्वार महापथे।
उतितीर्षुरहं भद्रे वैतरणयै नमौऽस्तुते।।
पिण्डदान कृत्वा यथा संभमं गोदान कुर्यात।’
गरूड़ पुराण में बताया गया है की यमलोक का रास्ता भयानक और पीड़ा देने वाला है। वहां एक नदी बहती है जोकि सौ योजना अर्थात एक सौ बीस किलोमीटर है। इस नदी में जल के स्थान पर रक्त और मवाद बहता है और इसके तट हड्डियों से भरे हैं।मगरमच्छ, सूई के समान मुखवाले भयानक कृमि, मछली और वज्र जैसी चोंचवाले गिद्धों का ये निवास स्थल है।
यम के दूत जब धरती से लाए गए व्यक्ति को इस नदी के समीप लाकर छोड़ देते हैं तो नदी में से जोर-जोर से गरजने की आवाज आने लगती है। नदी में प्रवाहित रक्त उफान मारने लगता है। पापी मनुष्य की जीवात्मा डर के मारे थर-थर कांपने लगती है।
केवल एक नाव के राही ही इस नदी को पार किया जा सकता है। उस नाव का नाविक एक प्रेत है। जो पिण्ड से बने शरीर में बसी आत्मा से प्रश्न करता है कि किस पुण्य के बल पर तुम नदी पार करोगे।
जिस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में गौदान की हो केवल वह व्यक्ति इस नदी को पार कर सकता है अन्य लोगों को यमदूत नाक में कांटा फंसाकर आकाश मार्ग से नदी के ऊपर से खींचते हुए ले जाते हैं। शास्त्रों में कुछ ऐसे व्रत और उपवास हैं जिनका पालन करने से गौदान का फल प्राप्त होता है।
पुराणों के अनुसार दान वितरण है। इस नदी का नाम वैतरणी है। अत: दान कर जो पुण्य कमाया जाता है उसके बल पर ही वैतरणी नदी को पार किया जा सकता है।



जानिए कौन है स्वाभिमानी व्यक्ति..

मार्गदर्शक चिंतन-

स्वाभिमान का मतलब अपनी बात पर अड़े रहना नहीं अपितु सत्य का साथ ना छोड़ना है। दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं अपितु दूसरों की बात का यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाब में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यह स्वाभिमान है।
अभिमानी वह है जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है। स्वाभिमानी वह है जो सत्य के रक्षण के लिए स्वयं कष्टों का वरण कर ले।
मै जो कह रहा हूँ वही सत्य है, यह अभिमानी का लक्षण है और जो सत्य होगा मै उसे स्वीकार कर लूँगा यह स्वाभिमानी का लक्षण है। अपने आत्म गौरव की प्रतिष्ठा जरुर बनी रहनी चाहिए मगर किसी को अकारण, अनावश्यक झुकाकर, गिराकर या रुलाकर नहीं।