Monday, 5 December 2016

क्या होती है ज्ञानी व्यक्ति की सोच...

मार्गदर्शक चिंतन-एक ज्ञानी व्यक्ति और संसारी में यही फर्क है कि ज्ञानी मरते हुए भी हँसता है और संसारी जीते हुए भी मरता है। ज्ञान हँसना नहीं सिखाता, बस रोने का कारण मिटा देता है। ऐसे ही अज्ञान रोना नहीं देता बस हँसने के कारणों को मिटा देता है।
ज्ञानी इसलिए हर स्थिति में प्रसन्न रहता है कि वो जानता है जो मुझे मिला, वह कभी मेरा था ही नहीं और जो कुछ मुझसे छूट रहा है, वह भी मेरा नहीं है। परिवर्तन ही दुनिया का शाश्वत सत्य है।
संसारी इसलिए रोता है, उसकी मान्यता में जो कुछ उसे मिला है उसी का था और उसी के दम पर मिला है। जो कुछ छूट रहा है सदा सर्वदा यह उस पर अपना अधिकार मान कर बैठा है। बस यही अशांत रहने का कारण है। मूढ़ता में नहीं ज्ञान में जियो ताकि आप हर स्थिति में प्रसन्न रह सकें।

Sunday, 4 December 2016

जानिए कौन से भगवान शिव के 11 रुद्र अवतार..

भगवान शिव के ग्यारह रुद्र रूप...

शास्त्रों के मुताबिक शिव ग्यारह अलग-अलग रुद्र रूपों में दु:खों का नाश करते हैं। यह ग्यारह रूप एकादश रुद्र के नाम से जाने जाते हैं। लगभग सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। भगवान शिव के अनगिनत रूप हैं, क्योंकि सारी प्रकृति को ही शिव स्वरूप माना गया है। यही कारण है कि शिव को दु:खों को नाश करने वाले देवता के रुप में पूजा जाता है।

1. शम्भू - शास्त्रों के मुताबिक यह रुद्र रूप साक्षात ब्रह्म है। इस रूप में ही वह जगत की रचना, पालन और संहार करते हैं।
2. पिनाकी - ज्ञान शक्ति रुपी चारों वेदों के के स्वरुप माने जाने वाले पिनाकी रुद्र दु:खों का अंत करते हैं।
3. गिरीश - कैलाशवासी होने से रुद्र का तीसरा रुप गिरीश कहलाता है। इस रुप में रुद्र सुख और आनंद देने वाले माने गए हैं।
4. स्थाणु - समाधि, तप और आत्मलीन होने से रुद्र का चौथा अवतार स्थाणु कहलाता है। इस रुप में पार्वती रूप शक्ति बाएं भाग में विराजित होती है।
5. भर्ग - भगवान रुद्र का यह रुप बहुत तेजोमयी है। इस रुप में रुद्र हर भय और पीड़ा का नाश करने वाले होते हैं।
6. भव - रुद्र का भव रुप ज्ञान बल, योग बल और भगवत प्रेम के रुप में सुख देने वाला माना जाता है।
7. सदाशिव - रुद्र का यह स्वरुप निराकार ब्रह्मका साकार रूप माना जाता है। जो सभी वैभव, सुख और आनंद देने वाला माना जाता है।
8. शिव - यह रुद्र रूप अंतहीन सुख देने वाला यानि कल्याण करने वाला माना जाता है। मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव आराधना महत्वपूर्ण मानीजाती है।
9. हर - इस रुप में नाग धारण करने वाले रुद्र शारीरिक, मानसिक और सांसारिक दु:खों को हर लेते हैं। नाग रूपी काल पर इन का नियंत्रण होता है।
10. शर्व - काल को भी काबू में रखने वाला यह रुद्र रूप शर्व कहलाता है।

  1. कपाली - कपाल रखने के कारण रुद्र का यह रूप कपाली कहलाता है। इस रुप में ही दक्ष का दंभ नष्ट किया, किंतु प्राणीमात्र के लिए रुद्र का यही रूप समस्त सुख देने वाला माना जाता है।

क्या है सुखी रहने का सही रास्ता..

जय श्री राधे-आज का भगवद चिन्तन,
11-10-2016
क्या आप सच में सुखी होना चाहते हैं तो फिर उन रास्तों का त्याग क्यों नहीं करते जिन रास्तों से दुःख आता है ? आपकी सुख की चाह तो ठीक है पर राह ठीक नहीं हैं। आपकी दशा नहीं दिशा विगडी है। सुख के लिए केवल दौड़ना ही काफी नहीं है अपितु सही मार्ग पर दौड़ना जरूरी है।
दुःख भगवान के द्वारा दिया गया कोई दंड नहीं है, यह तो असत्य का संग देने का फल है। आज का आदमी बड़ी दुविधा में है कभी तो राम का संग कर लेता है पर अवसर मिलते ही रावण का संग करने से भी नहीं चूकता है। आप पहले विचार करो कि राम के साथ जीवन जीना है या रावण के साथ राम माने सदगुण, रावण यानि दुर्गुण। जैसा चुनाव करोगे वैसा ही परिणाम प्राप्त होगा। धर्माचरण करने वाला परेशान तो हो सकता है पर पराजित कभी नहीं। सत्य पीड़ा देगा पराजय नहीं। हमे राममय (धर्ममय) जीवन जीना है, असत्य (रावण) के मार्ग को कभी भी नहीं चुनना है।

Saturday, 3 December 2016

जानिए रामायण में राम और सीता शब्द कितनी बार आया..और भी रोचक रहस्य

रामायण के कुछ रोचक तथ्य?
*1:~मानस में राम शब्द=1443 बार आया है।*
*2:~मानस में सीता शब्द=147 बार आया है।*
*3:~मानस में जानकी शब्द= 69 बार आया है।*
*4:~
मानस में बड़भागी शब्द=58 बार आया है।*
*5:~
मानस में कोटि शब्द=125 बार आया है।*
*6:~
मानस में एक बार शब्द= 18 बार आया है।*
*7:~
मानस में मन्दिर शब्द= 35 बार आया है।*
*8:~
मानस में मरम शब्द =40 आर आया है।*
*9:~
मानस में श्लोक संख्या=27 है।*
*10:~
लंका में राम जी =111 दिन रहे।*
*11:~
लंका में सीताजी =435 दिन रही।*
*12:~
मानस में चोपाई संख्या=4608 है।*
*13:~
मानस में दोहा संख्या=1074 है।*
*14:~
मानस में सोरठा=207 है।*
*15:~
मानस में छन्द=86 है।*
*16:~
सुग्रीव में बल था=10000 हाथियों का*
*17:~
सीता रानी बनी=33वर्ष की उम्र में।*
*18:~
मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र=77 वर्ष*
*19:~
पुष्पक विमान की चाल=400 मील/घण्टा*
*20:~
रामादल व् रावण दल का युद्ध=87 दिन चला*
*21:~
राम रावण युद्ध=32 दिन चला।*
*22:~
सेतु निर्माण=5 दिन में हुआ।*
*23:~
नलनील के पिता=विश्वकर्मा*
*24:~
त्रिजटा के पिता=विभीषण*
*25:~
दशरथ की उम्र थी=60000 वर्ष।*
*26:~
सुमन्त की उम्र=9999 वर्ष।*
*27:~
विश्वामित्र राम को ले गए=10 दिन के लिए।*
28:~
मानस में बैदेही शब्द=51 बार आया है ।

तृष्णा ही जन्म-मरण का कारण है..

मार्गदर्शक चिंतन-यहाँ प्रत्येक वस्तु , पदार्थ और व्यक्ति एक ना एक दिन सबको जीर्ण-शीर्ण अवस्था को प्राप्त करना है। जरा ( जरा माने -नष्ट होना, बुढ़ापा या काल) किसी को भी नहीं छोड़ती।
"
तृष्णैका तरुणायते "लेकिन तृष्णा कभी वृद्धा नहीं होती सदैव जवान बनी रहती है और ना ही इसका कभी नाश होता है। घर बन जाये यह आवश्यकता है, अच्छा घर बने यह इच्छा है और एक से क्या होगा ? दो तीन घर होने चाहियें , बस इसी का नाम तृष्णा है।
तृष्णा कभी ख़तम नहीं होती। विवेकवान बनो, बिचारवान बनो, और सावधान होओ। खुद से ना मिटे तृष्णा तो कृष्णा से प्रार्थना करो। कृष्णा का आश्रय ही तृष्णा को ख़तम कर सकता है।
ख्वाव देखे इस कदर मैंने
पूरे होते तो कहाँ तक होते

Thursday, 1 December 2016

जानिए भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी को किन स्थानों पर रहने और न रहने की हिदायत दी...

भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी जी की अचल स्थिरता हेतु निम्न उपाय बताये है:
जहां, शंख ध्वनि, भगवान् शिव की पूजा, ब्राह्मण भोजन तथा तुलसी नहीं होती, वहाँ लक्ष्मी जी का वास नहीं होता हैं।
जहाँ मेरी तथा मेरे भक्त की निंदा होती हैं, वहाँ से लक्ष्मी रुष्ट हो कर चली जाती हैं।
जो मनुष्य मेरे भक्ति से रहित हैं तथा एकादशी तथा मेरे जन्मदिन को भोजन करता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो व्यक्ति मेरे नाम का तथा अपनी कन्या का विक्रय करता हैं, अतिथि भोजन नहीं करते हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो ब्राह्मण अशुद्ध ह्रदय वाला, क्रूर, हिंसक, दूसरों की निंदा करने वाला, व्रत-उपवास तथा संध्या वंदन न करने वाला, होता हैं उसके घर से भी लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो नखों से निष्प्रयोजन अंग तोड़ता हैं या नखों को खुरेद्ता रहता हैं, जिसके यहाँ से ब्राह्मण निराश हो कर चला जाये, उस का भी लक्ष्मी जी त्याग कर देती हैं।
जो ब्राह्मण दिन में मैथुन करता हैं, सूर्योदय के समय भोजन करता हैं तथा दिन में शयन करता हैं उस के यहाँ से लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो ब्राह्मण आचार विहीन, दीक्षा हीन हैं उस के घर से भी लक्ष्मी जी चली जाती हैं।
जो नग्न हो कर अथवा भीगे पैर सोता हैं तथा वाचाल कि भाति निरंतर बोलता ही रहता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी चली जाती हैं।
जो व्यक्ति ब्राह्मण की निंदा करते हैं तथा द्वेष भाव रखते हैं, अन्य प्राणियों के प्रति दया भाव नहीं रखता, जीवों की हिंसा करता हैं, उसके घर का भी लक्ष्मी जी त्याग कर देती हैं।
जिस जिस स्थान पर भगवान् विष्णु की पूजा अर्चना होती हैं, संकीर्तन आदि होता हैं, भगवती लक्ष्मी उस स्थल का कभी त्याग नहीं करती हैं।
जहाँ श्री कृष्ण तथा उनके भक्तों का यशोगान होता हैं, वहाँ से लक्ष्मी जी कभी अंतर्धान नहीं होती हैं।
जिस स्थल पर शालग्राम, तुलसीदल तथा शंख रहते हैं, वहाँ पर लक्ष्मी जी सर्वदा निवास करती हैं।
जहाँ शिव-लिंग की पूजा तथा भगवती दुर्गा का नाम कीर्त्तन होता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी कही नहीं जाती।
जहाँ ब्राह्मणों की सेवा होती हैं, उन्हें भोजन कराया जाता हैं, वहाँ से भी लक्ष्मी जी कही नहीं जाती हैं।

कैसे करते हैं वेद-पुराण हमारा मार्गदर्शन

मार्गदर्शक-

? 
जिस प्रकार एक माँ का हाथ में डंडा लेने का उद्देश्य अपनी संतान को पीटना नहीं अपितु उसे थोडा सा भय दिखाकर गलत काम करने से रोकना होता है। ठीक इसी प्रकार हमारे शास्त्रों में भी दंड विधान का मतलव किसी को आतंकित करना अथवा भयभीत करना नहीं, थोडा सा भय दिखाकर मनुष्यों को कुमार्ग पर चलने से बचा लेना है।
? 
शास्त्रों का काम डराना नहीं है , जीवन को अराजकता से बचाना है। शास्त्र पशु बने मनुष्यों के लिए उस चाबुक के समान है जो सही दिशा में जाने को बार- बार प्रेरित करता है। शास्त्रों का उद्देश्य भयभीत करना नहीं आपितु भयमुक्त कर देना है।
शास्त्र घर में सजाकर रखने के लिए नहीं होते, जीवन में उतारकर कर्मों को सुन्दर बनाने के लिए होते हैं। अतः शास्त्रों से डरो नहीं बल्कि उनके बताये मार्ग पर चलो। ताकि आपको समझाने के लिए कोई विरोध रुपी शस्त्र का सहारा ना ले।